भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
माखी हाथी मृगा मीन अरु पिंगला लहिये ॥
चील्ह बाल कन्या कहूं तीर बनावनहार ।
सांप माकरी भृंग जो चौबीसौं उरधार ॥
दो० भिन्न भिन्न अब कहतहों, जुदो जुदो विस्तारि ।
ताको सुनि करि चेतियो, चरणदास नरनारि ॥
अष्टपदी ॥
दत्तात्रेय कि बात सकल अब गायहौं ।
बीसचारि गुरु किये ताहि समुझायहौं ॥
जिसकारण जिसहेतु जु उन ऐसी करी ।
जो जो शिक्षालई समझ हिरदयधरी ॥
जासों भजै मन रोग जक्त ब्याधानसी ।
उपजि परम संतोष क्षमा हिय आ बसी ॥
परम भये आनंद परमपद पाइया ।
जीवन्मुक्ता होय कि चाह उठाइया ॥
सोइ कहूं अब साध सबै सुनि लीजिये ।
शुकदेव परीक्षित सों कहो सांच पतीजिये ॥
दत्तात्रेय अवतार श्री भगवान के ।
राजा यदुसों बोलि वचन भाषत भये ॥
हमने गुरू चौबीस करे संसार में ।
तिनको ज्ञान विचार कहूं निरधारमें ॥
पहिले गुरुकी शरणगही बहुप्रीति सों ।
उन दीनो उपदेश मंत्र जौ रीतिसों ॥
दो० सतगुरु ने किरपा करी, धरो हाथ मम शीश ।
यही कही सुमिरण करो, ध्यान करो जगदीश ॥