भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६५
दो० तीजे गुरु आकाश को, कीन्हो समझ सँभार ।
जाकी मति के लेतही, पायो ब्रह्म विचार ॥
अष्टपदी ॥
तामें बरसै मेह और आंधी चलै ।
बिजली चमक वामाहिं और पावक जलै ॥
सदा रहै निर्लेप और निर्मल रहै ।
सबही जग वामाहिं आप निर्लम्भ है ॥
पवन हलावै नाहिं अग्नि जारै नहीं ।
ताहि न भिजवै नीर मरै मारै नहीं ॥
लघुदीरघ नहिं होय पुरुष नहिं नार है ।
नहिं सूक्ष्म नहिं भार वार नहिं पार है ॥
शब्द उठै बहु भांति वही जो अबोल है ।
उतपति परलय माहिं सदा जो अडोल है ॥
यह नभ ब्रह्मसमान लखो दृष्टान्त है ।
निरखि हिये की आंखि गयो सब भ्रान्त है ॥
भाँड़े कनक के होहिं चाँदी के देखिया ।
कांसी पितल के होयँ मट्टी के पेखिया ॥
सब माहीं आकाश एकही जानिया ।
यों घट घट में ब्रह्म सकल पहिंचानिया ॥
थिर चरही के माहिं जु थावर जंगमें ।
न्यारा अरु सब बीच भली विधि रंगमें ॥
जो बर्तन गयो फूटि रहो आकाशहूं ।
ऐसेहि काया बिनशि रहै नित ब्रह्मजू ॥
नित्य अनित्य विचार जभी निश्चय भई ।