सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 299, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 299

२६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
कोइ ऊपर चढ़ि जाय कोई आवै तले ।
जल बरषै ना बहै पवन सों ना हिलै ॥
वा पर्वतकी सीख बुद्धि में मानियां ।
देह लोभ दियो त्याग जुथिरता आनियां ॥
क्रोध दियो बिसराय जो तामस डारई ।
कोउ कहौ दुर्वचन कोउ क्यों न मारई ॥
क्रोध लोभ जो होय करै मन भंग है ।
कैसे सुमिरण होय लगे हरिरंग है ॥
क्रोध लोभ छुटिजाय रहन ये अगाध है ।
पर्वत की सम होय जो निश्चल साधहै ।
वृक्ष कहूँ अब जान जासु मति पाइया ॥
कहै चरणको दास जो चित्त लगाइया ।
दो० तरुवर ने काया धरी, परमारथ के हेत ।
कोऊ बैठे छाहँ में, कोऊ कारज लेत ॥
अष्टपदी ॥
दूजे देखे वृक्ष धरणि ऊपर भले ।
उनहूँकी लइ सीख गयो उनके तले ॥
मननहुती यह बात जु परकारज करूं ।
या प्राणी के काज नहीं करतो फिरूं ॥
जब आई यह रीति वृक्षकी दृष्टिमें ।
मैं लीन्हीं सोइ धारि भलीविधि सृष्टिमें ॥
कोई बैठे छाहँ कोई डारी हनै ।
कोई ले फल फूल वृक्ष कछु ना भनै ॥
परमारथ के काज वृक्षदेही धरी ।