भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
कोइ ऊपर चढ़ि जाय कोई आवै तले ।
जल बरषै ना बहै पवन सों ना हिलै ॥
वा पर्वतकी सीख बुद्धि में मानियां ।
देह लोभ दियो त्याग जुथिरता आनियां ॥
क्रोध दियो बिसराय जो तामस डारई ।
कोउ कहौ दुर्वचन कोउ क्यों न मारई ॥
क्रोध लोभ जो होय करै मन भंग है ।
कैसे सुमिरण होय लगे हरिरंग है ॥
क्रोध लोभ छुटिजाय रहन ये अगाध है ।
पर्वत की सम होय जो निश्चल साधहै ।
वृक्ष कहूँ अब जान जासु मति पाइया ॥
कहै चरणको दास जो चित्त लगाइया ।
दो० तरुवर ने काया धरी, परमारथ के हेत ।
कोऊ बैठे छाहँ में, कोऊ कारज लेत ॥
अष्टपदी ॥
दूजे देखे वृक्ष धरणि ऊपर भले ।
उनहूँकी लइ सीख गयो उनके तले ॥
मननहुती यह बात जु परकारज करूं ।
या प्राणी के काज नहीं करतो फिरूं ॥
जब आई यह रीति वृक्षकी दृष्टिमें ।
मैं लीन्हीं सोइ धारि भलीविधि सृष्टिमें ॥
कोई बैठे छाहँ कोई डारी हनै ।
कोई ले फल फूल वृक्ष कछु ना भनै ॥
परमारथ के काज वृक्षदेही धरी ।