भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमनविरक्तकरणगुटकासारवर्णन । २६१
अष्टपदी ॥
काया छीजत देखि यही मनमें धरो ।
बिरथा खोवत आयु नेम तप को करो ॥
गहि विरक्तकी रीति तभी गृहको तजो ।
रामभक्ति को चाव हमारे मन रचो ॥
जगसों रहो उदास वास हरिपद जहां ।
छुटि छुटि जावै ध्यान न मन लागे जहां ॥
बालक गारी देइ कोई बेलानहीं ।
शिरपै डारै खेह सोई बेकाजहीं ॥
हँसि हँसि ताली पीट जु हमरे सँगलगेँ ।
मैंहूं चलो उठाय तौ वे आगे भगेँ ॥
ताते निशिदिन क्रोध आपने मनधरूं ।
हरि सुमिरण गो भूलि जक्तमें यों फिरूं ॥
अब शिक्षा गुरु किये चौबीसौ भेदही ।
सो अब वर्णन करूं छुटै सब खेदही ॥
तिनसों सीखी चाल सभी उरमें धरी ।
चरणहिं दासा होय सुरति आनँद भरी ॥
दो० पहिले गुरु पृथ्वी किया, तीन सीख लइ तास ।
गिरिवर तरुवर मही जो, भयो चरण की दास ॥
अष्टपदी ॥
पहिले पृथ्वी गुरू हमारो जानिये ।
ताते लइ मति तीन साच हिय आनिये ॥
पहिले पर्वत एक मही ऊपर लखा ।
जाके निकटै जाय जु चढ़ि बैठा शिखा ॥