भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
भक्तिपदार्थवर्णन । २३१
बेद स्तुति भलि भांति सो लैकर चित धरी ॥
श्री नारायण बचन कहै इस रीति सों ।
नारद श्रोता भये अधिकहीं प्रीति सों ॥
श्री नारद वह कथा सकल मनभावती ।
वेदव्यास सूं कही जु अधिक सुहावती ॥
जैसी विधि जेहि भांति जो तिन सों हम सुनी ।
वाही विधि वाही रीति सों तुम आगे भनी ॥
ऐसे कहि शुकदेव परिक्षित राजसों ।
भाषा कर मैं कही मुक्ति के काज कों ॥
सब मिलि सुनियो संत बिबेक विचारियो ।
भक्ति हिये में राख आन सब डारियो ॥
भक्ति किये बस होय जक्त करतारही ।
ब्राह्मण शुद्ररु पुरुष करो कै नारही ॥
साधु सती अरु सूर बहुत दाता भये ।
इन की नाहीं जात चरनदासा कहै ॥
यह स्तुति जो कहै सुनै चित लायकै ।
सतसंगति लहै बास जो अघहि नसायकै ॥
समझ धरै मन मांहिं मुक्ति सोई पावई ।
भवसागर दुखरूप जहां नहीं आवई ॥
दो० वेद स्तुति पूरी करी, भेद दिया गुरुदेव ।
चरनदास के शीश पै, सदा रहो शुकदेव ॥
इति श्री भाषावेदस्तुति ॥
श्रीमदाचार्य्यवर्य्य श्यामाचरणदासजी रचित संपूर्णम् शुभम् ।
श्रीराधाकृष्णार्पणमस्तु ॥
—:०:—
३७
२३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ चीर हरण लीला ॥
( पद ) पैयां लागूं मोहन प्यारे दीजे म्हारो चीर, जाड़ो
लागै छैजी म्हांने जमुना के तीर । कहां सीखे ऐसी टेव अहो
बलवीर, हम अबला ठाढ़ी नगन शरीर ॥ कदम के ऊपर बैठे
बसन चुराय, माखन लै लै खाते हम सों सौ सौ हाहा खाय ।
विनती करते अति शीश नवाय, रखिये अब लाज हमारी
हूजिये सहाय ॥ तब बोले अंतरयामी अंतर उधार, लै लै
जावो वस्त्र अपने एहो ब्रजकी नार । प्रेम की भक्ति करी तुम
सुकुमार, प्रेम के आधीन फिरों भक्तन के लार ॥ अपनो भायो
कियो प्यारे श्याम सुजान, वस्त्र देदीने सखी छाड़ी कुलकी
कान । तन मन माहीं रमें कृष्ण भगवान, प्रीति की परीक्षा
करी नंद जू के कान ॥ यशोदा को छैया श्याम भैया बलदेव,
मानलई सत्य प्रीति सखियन की सेवा । हरि की लीला कही
शुक मुनि देव, चरनदास सखि पायो निज भेव ॥
अथ श्रीशुक मुनिराज अष्टक प्रारम्यते
पोडशवर्ष किशोर मूरति श्याम वरण दिगम्बरम् ।
घूँघरवाले केश झलके शुकमुनि चरण प्रणमहं ॥
पद्म आसन उद्र त्रिवलीं चरण पंकज शोभितं ।
आजानु भुज मुसकात मुखसों शुकमुनि चरणप्रणमहं ॥
गूढ़ यंत्र विशाल उर छबि नाभि गंभीर राजितं ।
जलजलोचन सुखदनासा, शुकमुनि चरण प्रणामहं ॥
व्यासनंदन भक्तवंदन मोह ममत्व निकंदनं ।
काम क्रोध मद लोभ न जिन में शुकमुनि चरणप्रणामहं ॥
ब्रह्मरूप अनूप मुनिबर पराशर कुल भूषणं ।
कृष्ण चरित पुनीत वरणत शुकमुनि चरणं प्रणामहं ॥
त्रिभुवन उजागर कृपासागर द्वंद संकट मोचनं ।
प्रेम मदमाते रहें नित शुकमुनि चरण प्रणामहं ॥
निरालम्भ निहभर्म निशि दिन स्थिर बुद्धि निकेतनं ।
धर्मधारी ब्रह्मचारी शुकमुनि चरण प्रणामहं ॥
पतितपावन भर्म नशावन शरणागत सुखदायकं ।
मायाजीतं गुणातीतं शुकमुनि चरण प्रणामहं ॥
श्रीशुकदेव अष्टक परम सुन्दर पठत पाप नशायकं ।
चरणदास शुकदेव स्वामी भक्ति मुक्ति फलदायकं ॥
इति अष्टक ॥
अथ मोह छुटावन अंग वर्णन ॥
कुंडलिया ॥
भक्ति दृढ़ावनकूं कहे नानाही परसंग ।
शुकदेव कृपा सों अब कहूं मोहछुटावन अंग ॥
मोह छुटावन अंग कोई हियमाहीं धारै ।
कुटुँब जालसुं छूटि लगै हरिचरणौ लारै ॥
चरणदास यौं कहत हैं उपजै मन वैराग ।
जक्त नींदही सूं खुलै चौथे पदमें जाग ॥
दो० गुरू पूजि जग छोड़िये, भवसागर के द्वन्ध ।
साधुनकी संगति करौ, तजौ जाति कुलबन्ध ॥
बन्धु नारि सुत कुटुँब सब, यमकी फांसी जान ।
तोहिं छुटावैं रामसूँ, इनका कहा न मान ॥
खैंचि पकड़ि ह्वां राखिहैं, जहां मोह का जाल ।
जीवत दुख बहु भांतिके, मुये नरक ततकाल ॥
या प्राणीकूं ठग लगै, सकल कुटुँब परिवार ।
२३४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तिनमें दो बलवन्त हैं, एक द्रव्य इक नार ॥
नारि किये दुख बहुत हैं, बन्धन बँधै अनेक ।
जो सुख चाहै जीवका, तिरियाकूं मत पेख ॥
द्रव्य माहिं दुख तीन हैं, यह तू निश्चय जान ।
आवत दुख राखत दुखी, जात प्राणकी हान ॥
ताते इनकी प्रीति मन, उठै तभी निरवार ।
ये दुर्जन दुख रूप हैं, ऐसो करो विचार ॥
जो कोई इनमें पगै, तिन सें छूटै राम ।
चरणदास यों कहत हैं, क्यों पावै हरिधाम ॥
हेरि फेरि धनको करत, बीतै पहर इकरात ।
तीनपहर निशिके रहैं, खोवै नारी साथ ॥
नारी के फैलाव को, दीखै ओर न छोर ।
द्रव्य माहिं तृष्णा रहै, चाहै लाख किरोर ॥
द्रव्य जोरि मरिजय जब, हो बैठे तहँ नाग ।
नारी में जो चित रहै, ह्वैहै कूकुर काग ॥
ऐसेही भरमत फिरै, लख चौरासी देह ।
कनक कामिनीकूं तजै, जबलग नाहीं नेह ॥
मूरख त्याग न करिसके, ज्ञानवन्त तजि देह ।
चौंकायल मृग ज्यों रहै, कहीं न साजै गेह ॥
जो कोइ छोड़ै कुटुंबही, ऐसी कर पहिंचान ।
जैसे छूटै बन्ध सूं, यम जोरासूं जान ॥
जीवत यम तौ कुटुंब है, घेरि घेरि दुख देय ।
ऐसे मानुष देहकूं, लूटै ही नित लेय ॥
कै ठग सबकूं जानिये, कै धाड़ी के चोर ।
भक्तिपदार्थवर्णन । २३५
रणजित कहै तु देखले, लूटत हैं निशि भोर ॥
बाहर कलकल करत हैं, भीतर लावहिं लाव ।
ऐसो बांधौ खैंचकरि, छुटै हाथ नहिं पाव ॥
लाजतौंक गलमें पड़ा, ममता ,बेरी पांय ।
रसरी मूरुख नेह की, लीन्हे हाथ बँधाय ॥
डारि दियो अज्ञान में, परो परो बिललाय ।
निकसनकूं जबहीं चहै, कुतका मोह लगाय ॥
रखवारे जहँ पांच हैं, इन्द्रिन के रस जान ।
तबहीं देह भुलायकै, जो कुछ उपजै ज्ञान ॥
कुटुँब ओर इन पांच को, एक मतोही जान ।
प्राणी कूं जग में फँसा, चहै खान अरु पान ॥
ये सब स्वारथही लगें, इसका सगा न कोय ।
जो शिर मार धरणि पर, कल्प कल्प करि रोय ॥
मात पिता सुत नारि की, इनकी उलटी रीति ।
जग में देह फँसाय कै, करिकै प्रीतिहि प्रीति ॥
जैसे बधिक बिछाय कै, जाल माहिं कण डार ।
प्रीति करै पक्षी गहै, पाछे करै जु खार ॥
जैसे ठग बहु प्यार करि, भोलापनहीं देह ।
पहिले लडू खवाय कै, पाछे सरबस लेह ॥
हित सूं हिरण बुलाय कै, गोली मारै तान ।
चरणदास यों कहतहैं, ऐसे इन कूं जान ॥
जलमें बंशी डारिया, अटकाया जहाँ मास ।
मछरी जानै हित कियो, लखो न अपनो नास ॥
भोंदू यह गति ना लखी, पड़ो कुमति के फंध ।
२३६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ज्यों की त्यों सूझी नहीं, किया मोह ने अंध ॥
सब ठग यह देखी नहीं, कपट हेत नहिं जान ।
इनही में मिलकर चलौ, समझौ ना अज्ञान ॥
अब इनके छल कहत हूँ, समझै होय उदास ।
जानै ना द्वाई रहे, कहै चरणही दास ॥
अब इनके छल कहि समझाऊं । भिन्न भिन्न परगट दिखलाऊं ॥
पिता कहै तुम पुत्र हमारे । बहुत भरोसे मोहिं तुम्हारे ॥
अब तुम ऐसी बिद्या पढ़ो । अपने कुल में ऊंचे चढ़ो ॥
सतसंगति में कभी न जइये । अपने घर में चित्त लगइये ॥
हम तो हैं दुनियां के क्रूते । जाति वरण में होहिं सपूते ॥
कृत्य करो पालौ सुत वाम । कथा कीरतन सूं क्या काम ॥
अब तुम ठौर हमारी हूजै । हमने किये सो तुमहूँ कीजै ॥
ऐसी बुद्धि बड़ाई दीन्ही । इनहू हिरदय में धरि लीन्ही ॥
चरणदास कहैं देखो प्यार । मुये नरक जीवितहौ ख्वार ॥
दो० पिता बुद्धि ऐसी दई, रहिये कुटुंब मंझारि ।
जो कुछ है सो जक्तमें, धन सम्पति सुत नारि ॥
हरिकी राह भुलाय करि, दोन्हो कुटुंब चिताय ।
ताते दुख जगमें घने, चौरासी भरमाय ॥
अब सुन माताहू की वातैं । अपना जान खियावै तातैं ॥
द्रव्यकाज उद्यमहीं कीजै । ला माता की गोदी दीजै ॥
करै कमाई सोई सपूता । नाहीं तौ वह पूत कपूता ॥
नारी कूं भूषण पहिनावो । सुत पुत्री को ब्याह रचावो ॥
पूजौ पित्तर देवी देवा । सकल कुटुंब की कीजै सेवा ॥
अपने कुलकोन्योति जिमावो । ताते बहुत बड़ाई पावो ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । २३७
बहु विधि स्वारथही सिखलावै । परमारथ की राह भुलावै ॥
बारबार जग में उरझावै । ऐसे तौ नितही चलि आवै ॥
जितका तितह्नांईं रखि लीन्हा । चरणदासकहें जान न दीन्हा ॥
दो० माताहू ने प्यार करि, बहुत दिया शिरभार ।
यही जो नीको धारियो, महल द्रव्य सुत नारि ॥
अब नारिकी गति सुनि लीजै । तामें चित्त कबहुँ नहिं दीजै ॥
छल बलकरि वश अपने राखै । मधुर वचन रससने जु भाखै ॥
कहै कि शिर के छत्र हमारे । हम तौ लागीं शरण तुम्हारे ॥
तुमतौ बहुतै लगौ पियारे । मोकों तजि मत हूजो न्यारे ॥
ऐसे कहि कहि बांधा चाहै । आठौ अंग काम के वाहै ॥
वस्त्र भूषण देह शिंगारै । नानाविधि करि रूप सँवारै ॥
करै कटाक्ष बहुतही भारै । वश करने को टोना डारै ॥
काजल भरी आंखसूं जोहै । अंग बिषे रस दै दै मोहै ॥
ह्यांसू निकसन कैसे पावै । चरणदास शुकदेव सुनावै ॥
दो० तिरियाही के जाल में, आय फँसै जो कोय ।
तल्फि तल्फि ह्नांईं रहै, निकसी सकै नहिं सोय ॥
सुत पुत्री बनितासूं जानौं । समधाने वासूं पहिंचानौं ॥
और बँधै बहुतै बँधवार । नाई ब्राह्मण बहु परिवार ॥
सेढ़ मसानी देवी भूत । ग्रह नक्षत्रहु लगै अऊत ॥
चौथ अहोई लागै सौन । तिरिया कारण साजो भौन ॥
औरौ बहुत बखेड़े जान । नारी से तोहीं पहिंचान ॥
महा अपरबल दुख तेहिमाहीं । मरिकै चौरासी में जाहीं ॥
२३८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ताते हूजे बेगि उदास । समुझितजौ तिरियाकी आस ॥
कहि शुकदेव चरणहीं दासा । सभी कुटुंब है नरक निवासा ॥
दो० सुतकी बोली तोतली, करै चोचले चाव ।
मन मोहै बाँधै घनो, छूटे को न उपाव ॥
हँसि गोदी में आयकरि, बहुत बढ़ावै नेह ।
तामें घने विकार हैं, अन्तकाल दुख देह ॥
मोह लगा मरजाय जब, तन मन लागै आग ।
चरणदास यों कहतहैं, सुख चाहै तौ त्याग ॥
जिहिकारण चिन्तालगे, जवलग घटमें प्रान ।
हरिगुरु हिये न आवई, यही जु पूरी हान ॥
तन छूटै सुत में रहै, एक नर तेरी आस ।
जनम जु शूकर को लहै, मुये नरकही जास ॥
कुटुंब बंध ऐसे करि जानौ । फांसीगर तिनकूं पहिंचानौ ॥
तोकूं डारै नरक मँझारा । ताते होहि सबन से न्यारा ॥
बहुतक दुर्जन हैं घटमाहीं । तू उनकूं जानतहै नाहीं ॥
हैं वैरी तू जानत मीता । स्वप्नेहूँ इनकी नहिं चीता ॥
काम क्रोध लोभ अरु मोहा । सबहीं राखैं तोसूं द्रोहा ॥
जिनसे गर्व मछरता भारी । जक्त वड़ाई तिनकी नारी ॥
आपा लिये सदाहीं रहै । टेढ़े वचन झूठ बहु कहै ॥
इनके संग घनेही दृष्टी । तेरे तन में रहैं अहष्टी ॥
नितही करै अकारज तेरा । चरणदास कहैं यहविधि घेरा ॥
दो० बहु वैरी घट में बसैं, तू नहिं जीतत कोय ।
निशिदिन घेरेही रहैं, छुटकारा नहिं होय ॥
जो कहुं निकसि बाहर आवै, अरु विरक्त का रूप बनावै ॥
भक्तिपदार्थवर्णन २३६-
कुटुंब छोड़ उपजै बैराग। जक्त रहा चरणों से लाग ॥
कछू वासना मनमें धँसी। जबहीं लोक बड़ाई हँसी ॥
पुष्ट भयो आपा अभिमान । सहजहि आया मोह दिवान ॥
सबही संगी लिये बुलाय । या विरक्त कूँ घेरो आय ॥
ताकूं बांधि मुरंडा कीन्हा। फेरि कुटुंब के माहीं दीन्हा ॥
कुटुंब मित्र गाढ़ा करि बांधा। बड़िवड़ि आंखौँ ऐसा आंधा ॥
चरणदास कहैं घरमें आया। घट के दुर्जन वाहि बँधाया ॥
दो० कुनवे में से निकसि करि, फिर कुनबे में जाय।
निश्चय नरकी होयगा, दुनियां में दुख पाय ॥
एक तपोवन में जा रहा। शीत उष्ण पावस शिर सहा ॥
सूखे पातों किया अहारा। छूटे सबही जग व्यवहारा ॥
रहै ध्यान में निशिदिन लागा। हरिके चरण कमलमें पागा ॥
महिमा सुनि राजा तहँ आया। दे परिक्रमा शीश नवाया ॥
हाथ जोरि ठाढ़ो फिरि भयो। तपसी मुख ना बैठन कह्यो ॥
ठाढ़े भये बार बहु भई। तब राजा ने मनमें कही ॥
यह तपसी है बहु अभिमानी । मोआवन महिमा नहिंजानी ॥
ऐसी कहि मनमाहीं ऐंठा। आपहि आप भूप वह बैठा ॥
दो० जो हरिके रँग में रँगे, भूपन सूं क्या काम ।
चरणदास कुछ भय नहीं, ना कुछ चाहिये दाम ॥
तपसी कछू न मुखसूं भाषा। राजाउठि चढ़ि मारग लागा ॥
क्रोध भरा महलन में आया। खोंटा मनमें मता उपाया ॥
पातुरि भेजि वाहि अजमाऊं। भेद झूठ सांचे को पाऊं ॥
जबहीं पातुरि लई बुलाई। ये बातें वाकूं समझाई ॥
कहै पातुरी आज्ञा दीजै। देखि तमाशा वाका लीजै ॥
आयसु लै पातुरि घर आई। प्रथममें लौंडी एक पठाई ॥
२४० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
वा तपसी का लावो भेद । कौन वस्तु से वाको हेत ॥
कहा सुभोजन करै अहारा । छुटै भजन सूं कौनी बारा ॥
बांदी गई भेद सो लाई । पातुरि कूं सब बात सुनाई ॥
दो० झारै जा मुख धोयकै, फिरि तलाव में न्हाय ॥
चरणदास फलपात जौं, गिरे पड़ेही खाय ॥
पातुरि सुनि मनमें डरपाई । कैसे वाकूं वश करुं जाई ॥
बिन वश किये भूप नहिं रीझै । काढ़ि नगर सूं बहुतै खीझै ॥
ताते मकर पेंच कछु कीजै । तपसी का मन करमें लीजै ॥
जो कहुँ इच्छा नेकहु पड़ये । छलबल करि वामदन१ जगइये ॥
यह विचार पातुरि जब कियो । नानाविधि भोजनकरिलियो ॥
गई तहां तपसी अस्थान । वहतौ करत हतोहरि ध्यान ॥
बैठ रही धीरज उर धारि । जबलग उठे ध्यान निरवारि ॥
उठे ध्यानते आंखें खोली । करिदण्डवत नारियों बोली ॥
पुत्र नहीं हमरे घरमाहीं । जिस कारण दर्शन कूं आई ॥
यह कहि भोंजन आगे राखा । तपसी भोंजन लिया न भाखा ॥
वादिन तौ योंही उठिआई । अंगुली टिकन ठौर नहिंपाई ॥
दूजे दिन गइ बहुत सबारा । न्हाकर आये थे उंहिबारा ॥
कहा कि भोजन हमरा कीजै । हमरे नैनन को सुख दीजै ॥
तपसी कहै न चित्त डुलाऊं । सूखे पात और फल खाऊं ॥
पातुरि कहै दूर सूं आई । तुमतौ दयावंत सुखदाई ॥
यही मान मेरो तुम राखो । बहुत नहीं अंगुली भरिचाखो ॥
कहिकरवचन वाहिपघिलाया । अंगुलीभरि भोजन चटवाया ॥
चाटत चाटत चाटत रहा । रणजीत कहैंयोंमनवहिगया ॥
१ काम ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । २४१
दो० पातुरिने कर जोरि करि, बहुरौ वचन सुनाय ।
एकवार अरु लीजिये, इन्द्रीजित ऋपिराय ॥
फिरि भारी अँगुली भरि लीन्हा । बहुरौ मुखके माहीं दीन्हा ॥
अँगुली टिकन कामकरि आई। घर आकर बहुतै हुलसाई ॥
फिर ह्वां दिना चार ठहराई । उत नहिं गई यही मन आई ॥
पातुरि चतुर ढील सूं गई । तपसी कही कहां तुम रही ॥
जबहीं पातुरि प्रीति पिछानी । अपनी कला पैठती जानी ॥
वादिन व्यंजन कछू न लाई । बहुविधि भोजन बात सुनाई ॥
घर ठाकुर सेवा चित लाऊं । नानाविधि के भोग लगाऊं ॥
लै आज्ञा निज भवन पधारी । चरणदास कहैं छल कियो नारी ॥
दो० तपसी कूं जीतन कियो, टेक बांधि करि वाद ।
हौरै हौरै लाय हूं, या जिह्वा के स्वाद ॥
नानाविधिके स्वादकरि, लैगई वाही पास ।
कह्यो कि यह परसाद है, लीजै कोई ग्रास ॥
ठाकुरको प्रसाद जु लीजै । याको नाहीं कबहुँ न कीजै ॥
नाहीं किये होय अपराध । तुमतौ कहियो पूरे साध ॥
कछुक पातुरि वचन सुनायो । कछुक तपसी के मन आयो ॥
डारौ हाथ थार के माहीं । ज्यों ज्यों खात सराहत जाहीं ॥
पातुरि कहो सदा लै आऊं । जो जो ठाकुर भोग लगाऊं ॥
यामें कछू दोष नहिं लागै । तन मनका सब पातक भागै ॥
वाकूं वश करिकै घर आई । सखियन कूं यह कथा सुनाई ॥
कामदेवकी सौगंद खाऊं । तपसी बँधुवाकरि दिखलाऊं ॥
दो० रसनास्वादहिवश किये, मनमें जीतन वाद ।
कभी आप बांदी कभी, पहुँचायाँ परसाद ॥
२४२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
कबहुँ वा तपसी ढिग जावै । नानाविधि के भोजन ख्वावै ॥
कबहुँ भेजै बांदी हाथा । कहियो छुट्टी मोहिं न नाथा ॥
वह जानै मम सेवा करै । यह तौ भजन तपस्या हरै ॥
एक दिना पातुरी ह्वां गई । हाथ जोरि भाषत यों भई ॥
कहो कि मेरे भवन पधारो । करो पवित्र जूंठनि डारो ॥
लावन की बहु बात बनाई । सो तपसी के मन नहिं भाई ॥
ह्वांई रही टोना सो कीन्हो । तपसीको मनवशकरिलीन्हो ॥
दूजे रस की कला दिखाई । मोह बढ़ो अरु आँख लजाई ॥
भोरभये फिर बात सुनाई । छलबल करि घरही लै आई ॥
चरणदास तपसी नहिं जानी । अजहूं ठगनी ना पहिचानी ॥
दो० घरमें ला बहु सुखदिया, दिना आठही राखि ।
तपसीहू वा वश भयो, पांचन सूं रस चाखि ॥
इन्द्रीवश पातुरि घर आया । अपने तपका तेज घटाया ॥
सिमटामन भया फूटक फूटा । लागा ध्यान रामका छूटा ॥
देखै घरके वैरी किया । पकड़ बांधि और कर दिया ॥
फिर पातुरि राजापै गई । तपसी ठगन बात सब कही ॥
नेक नेक सब समझाई । तब राजाकूं हांसी आई ॥
योंहीं कही वेगि लै आवो । वाकी सूरत हमैं दिखावो ॥
फिर पातुरि उलटीही धाई । तपसी कूं इक बात सुनाई ॥
राजा दर्शन करन बोलावै । जितसेती खाने कूं आवै ॥
वाकूँ चलकरि दर्शन दीजै । किरपा प्यार बहुतही कीजै ॥
हमतौ उनकी सदा कहावैं । नितउठिकरि मुजरेको जावैं ॥
ह्वांतौ अपना घरही जानौ । उठिये चलिये सकुच न मानौ ॥
पाछे तपसी आगे बाला । ऐसे राज दुआरे चाला ॥
जा राजा कूं दई अशीशा। राजा बैठे नायो शीशा॥
हँसिकरि कहीजु किरपा कीन्ही। यह नगरी अपनी करि लीन्ही॥
घर बैठे हम दर्शन पाये। वै धन हैं जो तुमको लाये॥
तपसी कही धन्य तुम राजा। बहुतन को सारतहौ काजा॥
तुम्हरो तेज देखि हम चीन्ही। तुम्हहूँ तपस्या आगे कीन्ही॥
विना तपस्या राज न पावै। वेद पुराणन में यौं गावै॥
हमहूँ दर्शन तुम्हरे पाये। तपसी कहि यों वचन सुनाये॥
भूपति बहुत अचम्भा कीन्हा। बहुत द्रव्य पातुरि को दीन्हा॥
फिरि राजा तपसीसूं बोला। खोंट हिये का सबही खोला॥
एक दिना हम तुम ढिग धाये। वनमें तुम्हरे दर्शन पाये॥
ठाढ़ा रह्यौं हौं बहुती बारा। ना तुम बोले नैन उघारा॥
आजद्योस ऐसा हरि कीन्हा। ह्यांईं आ तुम दर्शन दीन्हा॥
यह सुनि तपसी शोचि विचारा। तबहीं पातुरि सूं भयो न्यारा॥
वेगहि उठि जंगल कूं गया। चरणदास कहैं रमता भया॥
दो० जो इन्द्रिन के वश भयो, यही हाल है जाय।
पछतावा मन में रहै, करै हाय दुख हाय॥
छहौं चोर महा दुखदाई। सो या जगमें देह फँसाई॥
तन मन कूं बहु व्याधि लगावैं। कायिक बाचिक पाप जढ़ावैं॥
करम लगा बहुतै भरमावै। यम के छप्पन त्रास दिखावै॥
फिर चौरासी माहिं फिरावै। जठर अगिनिमें ताहि तपावै॥
जन्म भरण भारी दुख देवै। मानुष देहका सर्बस लेवै॥
तीन लोकमें डोलै हाला। सुरपुर मृत्यु बहुर पताला॥
कैसे मुक्ति धाम कूं पावै। जो इन्द्रिन के वश होजावै॥
२४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
छूटै जब गुरु किरपा करें । चरणदास के शिर कर धरैं ॥
दो० स्वारथही के सब सगे, कुटुंब मित्र कुल गोत ।
परमारथ समझावई, जो दयाल गुरु होत ॥
परमारथ में दुख मिटै, कलह कलपना जाय ।
स्वारथ माहीं सुख नहीं, तामें चित्त न लाय ॥
स्वारथ में चिन्ता घनी, जो हांकर हो गेह ।
विना आगकी चिता में, जीवत जरि है देह ॥
चिन्ता घट में नागिनी, ताके मुख हैं दोय ।
निशि दिन खाये जात हैं, जानसकै नहिं कोय ॥
ताघट चिन्ता नागिनी, जामुख जप नहिं होय ।
जो टुक आवै यादभी, उहीं जाय फिरि खोय ॥
चिन्ताही सूं लगत है, चरणदास उर आग ।
तहां ध्यान हरि चरण को, कैसेही अब लाग ॥
जक्त वासना के विषे, घर चिन्ता का जान ।
जगकी आशा छोड़ि करि, हरि सुमिरणही ठान ॥
आशा नदिया में चलै, सदा मनोरथ नीर ।
परमारथ उपजै वहै, मन नहिं पकड़ै धीर ॥
धीर बिना नहिं ध्यान है, निश्चल जप नहिं होय ।
जो चाहै हरिभक्त कूं, जक्त वासना खोय ॥
जबलग जगसूं प्रीति है, तबलग दुःख अपार ।
भय भारी चिन्ता घनी, भवन पिछानौदार ॥
जग सूं छुटि बाहर परै, उसी समय सब चैन ।
उपजै आनंद परमहीं, तहाँ कुछ लैन न दैन ॥
१ मंनोरथ ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । २४५
रहै एक हरिभक्तिही, बाधा सब छुटि जाहिं ।
जबै राम अपनो करैं, वेगहि पकरैं बाहिं ॥
ताते सुन मन मेरे मीत । जक्त छुटनकी राखो चीत ॥
ऐसा अवसर फिर नहिं पावों । काहे मानुष देह गँवावों ॥
संगी तेरा नहिं धनधाम । तू क्यों पचै मूढ़ बेकाम ॥
पिछली गई तासकूं रोय । आगे रही ताहि मत खोय ॥
इकइक घड़ी अमोलक जान । चेत चेत मत होय अजान ॥
अपने घरका करो सँभाल । ललकारत आवत है काल ॥
याते कीजै यही विचार । डारि सिदौसी जगजंजार ॥
शुकदेव कहीहो चरणहिं दास । हरिके चरणकमल करि वास ॥
दो० यामें ढील न कीजिये, यह विचार मन आन ।
चरणदास यों कहत हैं, यह गो यह मैदान ॥
आयुर्दा यों जात है, जस तरुवर की छांह ।
चेत सिताबी भक्ति में, तजो जक्त की बांह ॥
तूनही पकरो जक्त ने, तैंहीं पकरो आय ।
ज्यों नलिनी को सूवटा, धोखे पकड़ो जाय ॥
जैसे बाँदर आपहि फँसिया । समझावन मनमाहीं हँसिया ॥
मूठ चनों की जो वह तजता । तौ काहेकूं फँसा जु रहता ॥
ज्यों कांटेसूं मच्छी लागी । आपहि आई चली अभागी ॥
सरवर में तरवर की छाहीं । अजया देखि गिरी वा माहीं ॥
जैसें पक्षी जाल मँझारा । आपहि आय फँसा बजमारा ॥
खन्दक में हाथी आ परिया । लेनगयो कोउ आपहि गिरिया ॥
बाजत बीण मृगा चलि आया । पकर कौन चंचल कूं ल्याया ॥
योंही तुम अपनी गति जानौ । आपहि बधे यही पहिंचानौ ॥
२४६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ऐसे जगने तू नहिं पकड़ा । चरणदास कहैं नाहीं जकड़ा ॥
दो० छोड़ जक्तकी वासना, यही जु छुटन उपाव ।
ये मन ऐसी धारिये, अबहीं नीको दाव ॥
अबकी चूके चूक है, फिर पछितावा होय ।
जो तुम जक्तन छोड़िहौ, जन्म जायगो खोय ॥
जग माहीं न्यारे रहो, लगे रहो हरिध्यान ।
पृथ्वी पर देहीं रहे, परमेश्वर में प्रान ॥
ज्यों तिरिया पीहरवसै, सुरति पिया के माहिं ।
ऐसे जन जग में रहें, हरिकूं भूलैं नाहिं ॥
ज्यों किरपण बहुदामही, गाड़ि जिमींके नीच ।
सदा वाहि तक्तौ रहै, सुरति रहै ताबीच ॥
तन छूटे हो सरपही, जा बैठे वा ठौर ।
जहां आश तहाँ वास है, कहूँ न भर्मैं और ॥
चितरहै गोविंद के विषे, जग में सहज सुभाय ।
तनछूटै हरिकूं मिलै, चरणकमल लिपटाय ॥
जग त्यागो वैरागले, निश्चय मनकूं लाव ।
आठ पहर साठौ घरी, सुमिरन सुरति लगाव ॥
सबसूं रहु निरवैरता, गहौ दीनता ध्यान ।
अंत मुक्तिपद पाइहौ, जगमें होय न हान ॥
चरणदास यों कहत हैं, बड़ी दीनता जान ।
औरन की तौ क्या चलै, लगे न मायाबान ॥
दया नम्रता दीनता, क्षमा शील संतोष ।
इनकूं लै सुमिरण करै, निश्चय पावैं मोष ॥
ये सब लक्षण राम में, प्रकटत दीखैं मोहिं ।
भक्तिपदार्थवर्णन । २४७
जो वै आवै तुझ बिषे, प्यार करैं हरि तोहिं ॥
हरिसूं प्रीति लगायकै, सब सूँ लेहि उठाय ।
रहै सदा इक रामहीं, और सकलमिटि जाय ॥
मिटते सूंमत प्रीतिकरि, रहते सूं करि नेह ।
झूठे कूं तजि दीजिये, सांचे में करि गेह ॥
सांचा हरिका नाम है, झूठा यह संसार ।
शुकदेव कहिचरणदासहो, सुमिरण करो विचार ॥
दशइन्द्रिन कूं खैंचकरि, अभय अमरफल चाख ।
सहजहि सुमिरण होतहै, तामें मनकूं राख ॥
मानसरोवर देह में, मुक्ताहल जो श्वास ।
चुगिये हंस स्वरूप है, खुलै कर्म्मकी गांस ॥
अजपा को यहि अर्थ है, विना जपेही होत ।
कछुवाकी ज्यों सिमट करि, तहां लगावो गोत ॥
आवतही कूं देखिये, जाते कुं जो निहारि ।
ऐसे सुरत लगाइये, चरणदास हियंधारि ॥
सकारेतन सींचिये, हकारे सुख होय ।
ऐसे सुमिरण संत कूं, जानै बिरला कोय ॥
नाभिहिं१ सेति उठति है, फिर तामाहिं समाय ।
याको भेद अपारहैं, सतगुरु देहिं बताय ॥
नाभि नासिका माहिं करि, घाल हिंडोला झूल ।
उपजै अति आनन्दही, रहै न दुखका मूल ॥
ब्रह्म सिन्धुकी लहरहै, तामें न्हान सजाय ।
कलिमल सब छुटि जायँगे, पातक रहै न कोय ॥
अरसठ तीरथ तो बिषे, बाहर क्यों भटकाव ।
१ तोंदी ॥
१८
३४८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणदास यों कहत हैं, उलटाहो घर आव ॥
श्वासासँभलबिचारिकार, तहां करो विश्राम ।
जाते हरिही हरि कहौ, आवत कहिये श्याम ॥
श्वासा लेवै नाम बिन, सो जीवन धिकार ।
श्वास श्वासमें राम जप, यही धारणा धार ॥
उलट पलट जप रामही, टेढ़ा सीधा होय ।
याका फल नहिं जायगा, कैसेही लो कोय ॥
खाते पीते नाम ले, बैठे चलते सोय ।
सदा पवित्र नाम है, करै ऊजला तोय ॥
नीचन कूं ऊंचा करै, ऊंचन को कर देव ।
देवन कूं हरिही करै, रहै न दूजा भेव ॥
भरमत भरमत आइया, पाई मानुष देह ।
ऐसो अवसर फिरि कहां, नाम शिताबी लेह ॥
कै घरमें कै बाहरे, जो चित आवै नाम ।
दोनों होहिं बराबरी, कै जंगल कै ग्राम ॥
करै तपस्या नाम बिन, योग यज्ञ अरु दान ।
चरणदास यों कहत हैं, सबही थोथे जान ॥
अधिकी ऊंचा नाम है, सब करणी का जीव ।
अष्टादश अरु चारिका, मथिकरि काढ़ा घीव ॥
चारौयुग में देखिले, जिन जपिया जिन नाव ।
टेक पकरि आगे धँसै, परा न पीछे पाँव ॥
जैसी गति उनकी भई, गावत साधु पुरान ।
वैसी तेरी होयगी, यह निश्चय करि जान ॥
दुख धन्धे कूं छोड़करि, कलह कल्पना त्याग ।
भक्तिपदार्थवर्णन । २४६
शुकदेव कहि चरणदास कूं, राम भजन में लाग ॥
हरिके गुण माला करौ, रसना ऊपर लाव ।
कियाकियाहीदेखिकरि, ताहि सराहत जाव ॥
देखि देखि देखत रहो, अस्तुति मुखसूं भाख ।
वाकी चतुराई सवै, लैकरि मनमें राख ॥
वैसा तौ रँगरेज ना, वैसा छीपी नाहिं ।
वैसा कारीगर नहीं, या दुनिया के माहि ॥
अजब अजब अचरज किये, अद्भुत अधिक अपार ।
जल थल पवन आकाशमें, देखै दृष्टि उघार ॥
सृष्टि बाग माली रच्यौ, भांति भांति गुलज़ार ।
रीझरीझ शिर दीजिये, एहो निरख बहार ॥
कबहूं जग परगट करै, कबहूं करै अलोप १ ।
नानाविधि बाजी करै, आप रहत है गोप ॥
बाजीगर बाजी रची, सब गति पूरण साज ।
किये तमाशे बहुतही, तोहिं दिखावन काज ॥
देखि होय परसन्नहीं, तू वाको गुण मान ।
चरणदास जो बुद्धि है, अधिक सुघरता जान ॥
बहुत प्यार तोपै करै, तू नहिं जानत सार ।
वाहि भुलायेही फिरै, नेक न करैं सँभार ॥
राम बिसारो आदि सूं, लियो द्रव्य अरु नार ।
याही ते भरमत फिरौ, तन धरि वारंवार ॥
गइ सु गई अब राखिले, एहो मूढ़ अयान ।
निष्केवल हरिकूं रटौ, सीख गुरूकी मान ॥
सोवन में नहिं खोइये, जन्म पदारथ पाय ।
१ छिपा हुआ ॥
२५० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणदास है जागिये, आलस सकल गँवाय ॥
सोवनही में हानि है, जागन में बहु लाभ ।
बुद्धि उज्ज्वल होत है, मुखपर चढ़ै जु आभ ॥
दिन कूं हरिसुमिरणकरो, रैनि जाग करि ध्यान।
भूखराखि भोजनकरो, तजि सोवन की बान ॥
चारि पहर नहिं जगिसकै, आधी रात सूजाग ।
ध्यानकरो जपही करो, भजन करन कुं लाग ॥
जो नहिं श्रद्धा दोपहर, पिछले पहरे चेत ।
उठ बैठे रटना रटौ, प्रभुसूं लावहि हेत ॥
जागै ना पिछले पहर, ताके मुखड़े धूल ।
सुमिरै ना करतार कूं, सभी गँवावै मूल ॥
जागै न पिछले पहर, करैं न आतमध्यान ।
ते नर नरकै जाइगे, बहुत सहैं यमसान ॥
जागै ना पिछले पहर, कर न गुरु मत जाप ।
पोह फाटै सोवत रहै, ताको लागै पाप ॥
पिछले पहरे जागिकरि, भजन करै चितलाय ।
चरणदास वा जीवकी, निश्चय गति ह्वै जाय ॥
पिछले पहरे जागिकरि, भरि भरि अमृत पीव ।
विषयजक्तकी न रहै, अमर होय करि जीव ॥
जन्म छुटै मरणा छुटै, आवागवन छुटिजाय ।
एक पहर की रात सूं, बैठा हो गण गाय ॥
पहिले पहरे सब जगै, दूजे भोगी मान ।
तीजे पहरे चोरही, चौथे योगी जान ॥