भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणदास है जागिये, आलस सकल गँवाय ॥
सोवनही में हानि है, जागन में बहु लाभ ।
बुद्धि उज्ज्वल होत है, मुखपर चढ़ै जु आभ ॥
दिन कूं हरिसुमिरणकरो, रैनि जाग करि ध्यान।
भूखराखि भोजनकरो, तजि सोवन की बान ॥
चारि पहर नहिं जगिसकै, आधी रात सूजाग ।
ध्यानकरो जपही करो, भजन करन कुं लाग ॥
जो नहिं श्रद्धा दोपहर, पिछले पहरे चेत ।
उठ बैठे रटना रटौ, प्रभुसूं लावहि हेत ॥
जागै ना पिछले पहर, ताके मुखड़े धूल ।
सुमिरै ना करतार कूं, सभी गँवावै मूल ॥
जागै न पिछले पहर, करैं न आतमध्यान ।
ते नर नरकै जाइगे, बहुत सहैं यमसान ॥
जागै ना पिछले पहर, कर न गुरु मत जाप ।
पोह फाटै सोवत रहै, ताको लागै पाप ॥
पिछले पहरे जागिकरि, भजन करै चितलाय ।
चरणदास वा जीवकी, निश्चय गति ह्वै जाय ॥
पिछले पहरे जागिकरि, भरि भरि अमृत पीव ।
विषयजक्तकी न रहै, अमर होय करि जीव ॥
जन्म छुटै मरणा छुटै, आवागवन छुटिजाय ।
एक पहर की रात सूं, बैठा हो गण गाय ॥
पहिले पहरे सब जगै, दूजे भोगी मान ।
तीजे पहरे चोरही, चौथे योगी जान ॥