भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 285, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें३४८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणदास यों कहत हैं, उलटाहो घर आव ॥
श्वासासँभलबिचारिकार, तहां करो विश्राम ।
जाते हरिही हरि कहौ, आवत कहिये श्याम ॥
श्वासा लेवै नाम बिन, सो जीवन धिकार ।
श्वास श्वासमें राम जप, यही धारणा धार ॥
उलट पलट जप रामही, टेढ़ा सीधा होय ।
याका फल नहिं जायगा, कैसेही लो कोय ॥
खाते पीते नाम ले, बैठे चलते सोय ।
सदा पवित्र नाम है, करै ऊजला तोय ॥
नीचन कूं ऊंचा करै, ऊंचन को कर देव ।
देवन कूं हरिही करै, रहै न दूजा भेव ॥
भरमत भरमत आइया, पाई मानुष देह ।
ऐसो अवसर फिरि कहां, नाम शिताबी लेह ॥
कै घरमें कै बाहरे, जो चित आवै नाम ।
दोनों होहिं बराबरी, कै जंगल कै ग्राम ॥
करै तपस्या नाम बिन, योग यज्ञ अरु दान ।
चरणदास यों कहत हैं, सबही थोथे जान ॥
अधिकी ऊंचा नाम है, सब करणी का जीव ।
अष्टादश अरु चारिका, मथिकरि काढ़ा घीव ॥
चारौयुग में देखिले, जिन जपिया जिन नाव ।
टेक पकरि आगे धँसै, परा न पीछे पाँव ॥
जैसी गति उनकी भई, गावत साधु पुरान ।
वैसी तेरी होयगी, यह निश्चय करि जान ॥
दुख धन्धे कूं छोड़करि, कलह कल्पना त्याग ।