भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 276, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंभक्तिपदार्थवर्णन २३६-
कुटुंब छोड़ उपजै बैराग। जक्त रहा चरणों से लाग ॥
कछू वासना मनमें धँसी। जबहीं लोक बड़ाई हँसी ॥
पुष्ट भयो आपा अभिमान । सहजहि आया मोह दिवान ॥
सबही संगी लिये बुलाय । या विरक्त कूँ घेरो आय ॥
ताकूं बांधि मुरंडा कीन्हा। फेरि कुटुंब के माहीं दीन्हा ॥
कुटुंब मित्र गाढ़ा करि बांधा। बड़िवड़ि आंखौँ ऐसा आंधा ॥
चरणदास कहैं घरमें आया। घट के दुर्जन वाहि बँधाया ॥
दो० कुनवे में से निकसि करि, फिर कुनबे में जाय।
निश्चय नरकी होयगा, दुनियां में दुख पाय ॥
एक तपोवन में जा रहा। शीत उष्ण पावस शिर सहा ॥
सूखे पातों किया अहारा। छूटे सबही जग व्यवहारा ॥
रहै ध्यान में निशिदिन लागा। हरिके चरण कमलमें पागा ॥
महिमा सुनि राजा तहँ आया। दे परिक्रमा शीश नवाया ॥
हाथ जोरि ठाढ़ो फिरि भयो। तपसी मुख ना बैठन कह्यो ॥
ठाढ़े भये बार बहु भई। तब राजा ने मनमें कही ॥
यह तपसी है बहु अभिमानी । मोआवन महिमा नहिंजानी ॥
ऐसी कहि मनमाहीं ऐंठा। आपहि आप भूप वह बैठा ॥
दो० जो हरिके रँग में रँगे, भूपन सूं क्या काम ।
चरणदास कुछ भय नहीं, ना कुछ चाहिये दाम ॥
तपसी कछू न मुखसूं भाषा। राजाउठि चढ़ि मारग लागा ॥
क्रोध भरा महलन में आया। खोंटा मनमें मता उपाया ॥
पातुरि भेजि वाहि अजमाऊं। भेद झूठ सांचे को पाऊं ॥
जबहीं पातुरि लई बुलाई। ये बातें वाकूं समझाई ॥
कहै पातुरी आज्ञा दीजै। देखि तमाशा वाका लीजै ॥
आयसु लै पातुरि घर आई। प्रथममें लौंडी एक पठाई ॥