भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
छूटै जब गुरु किरपा करें । चरणदास के शिर कर धरैं ॥
दो० स्वारथही के सब सगे, कुटुंब मित्र कुल गोत ।
परमारथ समझावई, जो दयाल गुरु होत ॥
परमारथ में दुख मिटै, कलह कलपना जाय ।
स्वारथ माहीं सुख नहीं, तामें चित्त न लाय ॥
स्वारथ में चिन्ता घनी, जो हांकर हो गेह ।
विना आगकी चिता में, जीवत जरि है देह ॥
चिन्ता घट में नागिनी, ताके मुख हैं दोय ।
निशि दिन खाये जात हैं, जानसकै नहिं कोय ॥
ताघट चिन्ता नागिनी, जामुख जप नहिं होय ।
जो टुक आवै यादभी, उहीं जाय फिरि खोय ॥
चिन्ताही सूं लगत है, चरणदास उर आग ।
तहां ध्यान हरि चरण को, कैसेही अब लाग ॥
जक्त वासना के विषे, घर चिन्ता का जान ।
जगकी आशा छोड़ि करि, हरि सुमिरणही ठान ॥
आशा नदिया में चलै, सदा मनोरथ नीर ।
परमारथ उपजै वहै, मन नहिं पकड़ै धीर ॥
धीर बिना नहिं ध्यान है, निश्चल जप नहिं होय ।
जो चाहै हरिभक्त कूं, जक्त वासना खोय ॥
जबलग जगसूं प्रीति है, तबलग दुःख अपार ।
भय भारी चिन्ता घनी, भवन पिछानौदार ॥
जग सूं छुटि बाहर परै, उसी समय सब चैन ।
उपजै आनंद परमहीं, तहाँ कुछ लैन न दैन ॥
१ मंनोरथ ॥