भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 277, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें२४० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
वा तपसी का लावो भेद । कौन वस्तु से वाको हेत ॥
कहा सुभोजन करै अहारा । छुटै भजन सूं कौनी बारा ॥
बांदी गई भेद सो लाई । पातुरि कूं सब बात सुनाई ॥
दो० झारै जा मुख धोयकै, फिरि तलाव में न्हाय ॥
चरणदास फलपात जौं, गिरे पड़ेही खाय ॥
पातुरि सुनि मनमें डरपाई । कैसे वाकूं वश करुं जाई ॥
बिन वश किये भूप नहिं रीझै । काढ़ि नगर सूं बहुतै खीझै ॥
ताते मकर पेंच कछु कीजै । तपसी का मन करमें लीजै ॥
जो कहुँ इच्छा नेकहु पड़ये । छलबल करि वामदन१ जगइये ॥
यह विचार पातुरि जब कियो । नानाविधि भोजनकरिलियो ॥
गई तहां तपसी अस्थान । वहतौ करत हतोहरि ध्यान ॥
बैठ रही धीरज उर धारि । जबलग उठे ध्यान निरवारि ॥
उठे ध्यानते आंखें खोली । करिदण्डवत नारियों बोली ॥
पुत्र नहीं हमरे घरमाहीं । जिस कारण दर्शन कूं आई ॥
यह कहि भोंजन आगे राखा । तपसी भोंजन लिया न भाखा ॥
वादिन तौ योंही उठिआई । अंगुली टिकन ठौर नहिंपाई ॥
दूजे दिन गइ बहुत सबारा । न्हाकर आये थे उंहिबारा ॥
कहा कि भोजन हमरा कीजै । हमरे नैनन को सुख दीजै ॥
तपसी कहै न चित्त डुलाऊं । सूखे पात और फल खाऊं ॥
पातुरि कहै दूर सूं आई । तुमतौ दयावंत सुखदाई ॥
यही मान मेरो तुम राखो । बहुत नहीं अंगुली भरिचाखो ॥
कहिकरवचन वाहिपघिलाया । अंगुलीभरि भोजन चटवाया ॥
चाटत चाटत चाटत रहा । रणजीत कहैंयोंमनवहिगया ॥
१ काम ॥