भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 286, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंभक्तिपदार्थवर्णन । २४६
शुकदेव कहि चरणदास कूं, राम भजन में लाग ॥
हरिके गुण माला करौ, रसना ऊपर लाव ।
कियाकियाहीदेखिकरि, ताहि सराहत जाव ॥
देखि देखि देखत रहो, अस्तुति मुखसूं भाख ।
वाकी चतुराई सवै, लैकरि मनमें राख ॥
वैसा तौ रँगरेज ना, वैसा छीपी नाहिं ।
वैसा कारीगर नहीं, या दुनिया के माहि ॥
अजब अजब अचरज किये, अद्भुत अधिक अपार ।
जल थल पवन आकाशमें, देखै दृष्टि उघार ॥
सृष्टि बाग माली रच्यौ, भांति भांति गुलज़ार ।
रीझरीझ शिर दीजिये, एहो निरख बहार ॥
कबहूं जग परगट करै, कबहूं करै अलोप १ ।
नानाविधि बाजी करै, आप रहत है गोप ॥
बाजीगर बाजी रची, सब गति पूरण साज ।
किये तमाशे बहुतही, तोहिं दिखावन काज ॥
देखि होय परसन्नहीं, तू वाको गुण मान ।
चरणदास जो बुद्धि है, अधिक सुघरता जान ॥
बहुत प्यार तोपै करै, तू नहिं जानत सार ।
वाहि भुलायेही फिरै, नेक न करैं सँभार ॥
राम बिसारो आदि सूं, लियो द्रव्य अरु नार ।
याही ते भरमत फिरौ, तन धरि वारंवार ॥
गइ सु गई अब राखिले, एहो मूढ़ अयान ।
निष्केवल हरिकूं रटौ, सीख गुरूकी मान ॥
सोवन में नहिं खोइये, जन्म पदारथ पाय ।
१ छिपा हुआ ॥