भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 280, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंजा राजा कूं दई अशीशा। राजा बैठे नायो शीशा॥
हँसिकरि कहीजु किरपा कीन्ही। यह नगरी अपनी करि लीन्ही॥
घर बैठे हम दर्शन पाये। वै धन हैं जो तुमको लाये॥
तपसी कही धन्य तुम राजा। बहुतन को सारतहौ काजा॥
तुम्हरो तेज देखि हम चीन्ही। तुम्हहूँ तपस्या आगे कीन्ही॥
विना तपस्या राज न पावै। वेद पुराणन में यौं गावै॥
हमहूँ दर्शन तुम्हरे पाये। तपसी कहि यों वचन सुनाये॥
भूपति बहुत अचम्भा कीन्हा। बहुत द्रव्य पातुरि को दीन्हा॥
फिरि राजा तपसीसूं बोला। खोंट हिये का सबही खोला॥
एक दिना हम तुम ढिग धाये। वनमें तुम्हरे दर्शन पाये॥
ठाढ़ा रह्यौं हौं बहुती बारा। ना तुम बोले नैन उघारा॥
आजद्योस ऐसा हरि कीन्हा। ह्यांईं आ तुम दर्शन दीन्हा॥
यह सुनि तपसी शोचि विचारा। तबहीं पातुरि सूं भयो न्यारा॥
वेगहि उठि जंगल कूं गया। चरणदास कहैं रमता भया॥
दो० जो इन्द्रिन के वश भयो, यही हाल है जाय।
पछतावा मन में रहै, करै हाय दुख हाय॥
छहौं चोर महा दुखदाई। सो या जगमें देह फँसाई॥
तन मन कूं बहु व्याधि लगावैं। कायिक बाचिक पाप जढ़ावैं॥
करम लगा बहुतै भरमावै। यम के छप्पन त्रास दिखावै॥
फिर चौरासी माहिं फिरावै। जठर अगिनिमें ताहि तपावै॥
जन्म भरण भारी दुख देवै। मानुष देहका सर्बस लेवै॥
तीन लोकमें डोलै हाला। सुरपुर मृत्यु बहुर पताला॥
कैसे मुक्ति धाम कूं पावै। जो इन्द्रिन के वश होजावै॥