भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिपदार्थवर्णन । २४१
दो० पातुरिने कर जोरि करि, बहुरौ वचन सुनाय ।
एकवार अरु लीजिये, इन्द्रीजित ऋपिराय ॥
फिरि भारी अँगुली भरि लीन्हा । बहुरौ मुखके माहीं दीन्हा ॥
अँगुली टिकन कामकरि आई। घर आकर बहुतै हुलसाई ॥
फिर ह्वां दिना चार ठहराई । उत नहिं गई यही मन आई ॥
पातुरि चतुर ढील सूं गई । तपसी कही कहां तुम रही ॥
जबहीं पातुरि प्रीति पिछानी । अपनी कला पैठती जानी ॥
वादिन व्यंजन कछू न लाई । बहुविधि भोजन बात सुनाई ॥
घर ठाकुर सेवा चित लाऊं । नानाविधि के भोग लगाऊं ॥
लै आज्ञा निज भवन पधारी । चरणदास कहैं छल कियो नारी ॥
दो० तपसी कूं जीतन कियो, टेक बांधि करि वाद ।
हौरै हौरै लाय हूं, या जिह्वा के स्वाद ॥
नानाविधिके स्वादकरि, लैगई वाही पास ।
कह्यो कि यह परसाद है, लीजै कोई ग्रास ॥
ठाकुरको प्रसाद जु लीजै । याको नाहीं कबहुँ न कीजै ॥
नाहीं किये होय अपराध । तुमतौ कहियो पूरे साध ॥
कछुक पातुरि वचन सुनायो । कछुक तपसी के मन आयो ॥
डारौ हाथ थार के माहीं । ज्यों ज्यों खात सराहत जाहीं ॥
पातुरि कहो सदा लै आऊं । जो जो ठाकुर भोग लगाऊं ॥
यामें कछू दोष नहिं लागै । तन मनका सब पातक भागै ॥
वाकूं वश करिकै घर आई । सखियन कूं यह कथा सुनाई ॥
कामदेवकी सौगंद खाऊं । तपसी बँधुवाकरि दिखलाऊं ॥
दो० रसनास्वादहिवश किये, मनमें जीतन वाद ।
कभी आप बांदी कभी, पहुँचायाँ परसाद ॥