भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिपदार्थवर्णन । २४५
रहै एक हरिभक्तिही, बाधा सब छुटि जाहिं ।
जबै राम अपनो करैं, वेगहि पकरैं बाहिं ॥
ताते सुन मन मेरे मीत । जक्त छुटनकी राखो चीत ॥
ऐसा अवसर फिर नहिं पावों । काहे मानुष देह गँवावों ॥
संगी तेरा नहिं धनधाम । तू क्यों पचै मूढ़ बेकाम ॥
पिछली गई तासकूं रोय । आगे रही ताहि मत खोय ॥
इकइक घड़ी अमोलक जान । चेत चेत मत होय अजान ॥
अपने घरका करो सँभाल । ललकारत आवत है काल ॥
याते कीजै यही विचार । डारि सिदौसी जगजंजार ॥
शुकदेव कहीहो चरणहिं दास । हरिके चरणकमल करि वास ॥
दो० यामें ढील न कीजिये, यह विचार मन आन ।
चरणदास यों कहत हैं, यह गो यह मैदान ॥
आयुर्दा यों जात है, जस तरुवर की छांह ।
चेत सिताबी भक्ति में, तजो जक्त की बांह ॥
तूनही पकरो जक्त ने, तैंहीं पकरो आय ।
ज्यों नलिनी को सूवटा, धोखे पकड़ो जाय ॥
जैसे बाँदर आपहि फँसिया । समझावन मनमाहीं हँसिया ॥
मूठ चनों की जो वह तजता । तौ काहेकूं फँसा जु रहता ॥
ज्यों कांटेसूं मच्छी लागी । आपहि आई चली अभागी ॥
सरवर में तरवर की छाहीं । अजया देखि गिरी वा माहीं ॥
जैसें पक्षी जाल मँझारा । आपहि आय फँसा बजमारा ॥
खन्दक में हाथी आ परिया । लेनगयो कोउ आपहि गिरिया ॥
बाजत बीण मृगा चलि आया । पकर कौन चंचल कूं ल्याया ॥
योंही तुम अपनी गति जानौ । आपहि बधे यही पहिंचानौ ॥