भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
कबहुँ वा तपसी ढिग जावै । नानाविधि के भोजन ख्वावै ॥
कबहुँ भेजै बांदी हाथा । कहियो छुट्टी मोहिं न नाथा ॥
वह जानै मम सेवा करै । यह तौ भजन तपस्या हरै ॥
एक दिना पातुरी ह्वां गई । हाथ जोरि भाषत यों भई ॥
कहो कि मेरे भवन पधारो । करो पवित्र जूंठनि डारो ॥
लावन की बहु बात बनाई । सो तपसी के मन नहिं भाई ॥
ह्वांई रही टोना सो कीन्हो । तपसीको मनवशकरिलीन्हो ॥
दूजे रस की कला दिखाई । मोह बढ़ो अरु आँख लजाई ॥
भोरभये फिर बात सुनाई । छलबल करि घरही लै आई ॥
चरणदास तपसी नहिं जानी । अजहूं ठगनी ना पहिचानी ॥
दो० घरमें ला बहु सुखदिया, दिना आठही राखि ।
तपसीहू वा वश भयो, पांचन सूं रस चाखि ॥
इन्द्रीवश पातुरि घर आया । अपने तपका तेज घटाया ॥
सिमटामन भया फूटक फूटा । लागा ध्यान रामका छूटा ॥
देखै घरके वैरी किया । पकड़ बांधि और कर दिया ॥
फिर पातुरि राजापै गई । तपसी ठगन बात सब कही ॥
नेक नेक सब समझाई । तब राजाकूं हांसी आई ॥
योंहीं कही वेगि लै आवो । वाकी सूरत हमैं दिखावो ॥
फिर पातुरि उलटीही धाई । तपसी कूं इक बात सुनाई ॥
राजा दर्शन करन बोलावै । जितसेती खाने कूं आवै ॥
वाकूँ चलकरि दर्शन दीजै । किरपा प्यार बहुतही कीजै ॥
हमतौ उनकी सदा कहावैं । नितउठिकरि मुजरेको जावैं ॥
ह्वांतौ अपना घरही जानौ । उठिये चलिये सकुच न मानौ ॥
पाछे तपसी आगे बाला । ऐसे राज दुआरे चाला ॥