भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ताते हूजे बेगि उदास । समुझितजौ तिरियाकी आस ॥
कहि शुकदेव चरणहीं दासा । सभी कुटुंब है नरक निवासा ॥
दो० सुतकी बोली तोतली, करै चोचले चाव ।
मन मोहै बाँधै घनो, छूटे को न उपाव ॥
हँसि गोदी में आयकरि, बहुत बढ़ावै नेह ।
तामें घने विकार हैं, अन्तकाल दुख देह ॥
मोह लगा मरजाय जब, तन मन लागै आग ।
चरणदास यों कहतहैं, सुख चाहै तौ त्याग ॥
जिहिकारण चिन्तालगे, जवलग घटमें प्रान ।
हरिगुरु हिये न आवई, यही जु पूरी हान ॥
तन छूटै सुत में रहै, एक नर तेरी आस ।
जनम जु शूकर को लहै, मुये नरकही जास ॥
कुटुंब बंध ऐसे करि जानौ । फांसीगर तिनकूं पहिंचानौ ॥
तोकूं डारै नरक मँझारा । ताते होहि सबन से न्यारा ॥
बहुतक दुर्जन हैं घटमाहीं । तू उनकूं जानतहै नाहीं ॥
हैं वैरी तू जानत मीता । स्वप्नेहूँ इनकी नहिं चीता ॥
काम क्रोध लोभ अरु मोहा । सबहीं राखैं तोसूं द्रोहा ॥
जिनसे गर्व मछरता भारी । जक्त वड़ाई तिनकी नारी ॥
आपा लिये सदाहीं रहै । टेढ़े वचन झूठ बहु कहै ॥
इनके संग घनेही दृष्टी । तेरे तन में रहैं अहष्टी ॥
नितही करै अकारज तेरा । चरणदास कहैं यहविधि घेरा ॥
दो० बहु वैरी घट में बसैं, तू नहिं जीतत कोय ।
निशिदिन घेरेही रहैं, छुटकारा नहिं होय ॥
जो कहुं निकसि बाहर आवै, अरु विरक्त का रूप बनावै ॥