भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिपदार्थवर्णन । २४७
जो वै आवै तुझ बिषे, प्यार करैं हरि तोहिं ॥
हरिसूं प्रीति लगायकै, सब सूँ लेहि उठाय ।
रहै सदा इक रामहीं, और सकलमिटि जाय ॥
मिटते सूंमत प्रीतिकरि, रहते सूं करि नेह ।
झूठे कूं तजि दीजिये, सांचे में करि गेह ॥
सांचा हरिका नाम है, झूठा यह संसार ।
शुकदेव कहिचरणदासहो, सुमिरण करो विचार ॥
दशइन्द्रिन कूं खैंचकरि, अभय अमरफल चाख ।
सहजहि सुमिरण होतहै, तामें मनकूं राख ॥
मानसरोवर देह में, मुक्ताहल जो श्वास ।
चुगिये हंस स्वरूप है, खुलै कर्म्मकी गांस ॥
अजपा को यहि अर्थ है, विना जपेही होत ।
कछुवाकी ज्यों सिमट करि, तहां लगावो गोत ॥
आवतही कूं देखिये, जाते कुं जो निहारि ।
ऐसे सुरत लगाइये, चरणदास हियंधारि ॥
सकारेतन सींचिये, हकारे सुख होय ।
ऐसे सुमिरण संत कूं, जानै बिरला कोय ॥
नाभिहिं१ सेति उठति है, फिर तामाहिं समाय ।
याको भेद अपारहैं, सतगुरु देहिं बताय ॥
नाभि नासिका माहिं करि, घाल हिंडोला झूल ।
उपजै अति आनन्दही, रहै न दुखका मूल ॥
ब्रह्म सिन्धुकी लहरहै, तामें न्हान सजाय ।
कलिमल सब छुटि जायँगे, पातक रहै न कोय ॥
अरसठ तीरथ तो बिषे, बाहर क्यों भटकाव ।
१ तोंदी ॥
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