भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिपदार्थवर्णन । २३७
बहु विधि स्वारथही सिखलावै । परमारथ की राह भुलावै ॥
बारबार जग में उरझावै । ऐसे तौ नितही चलि आवै ॥
जितका तितह्नांईं रखि लीन्हा । चरणदासकहें जान न दीन्हा ॥
दो० माताहू ने प्यार करि, बहुत दिया शिरभार ।
यही जो नीको धारियो, महल द्रव्य सुत नारि ॥
अब नारिकी गति सुनि लीजै । तामें चित्त कबहुँ नहिं दीजै ॥
छल बलकरि वश अपने राखै । मधुर वचन रससने जु भाखै ॥
कहै कि शिर के छत्र हमारे । हम तौ लागीं शरण तुम्हारे ॥
तुमतौ बहुतै लगौ पियारे । मोकों तजि मत हूजो न्यारे ॥
ऐसे कहि कहि बांधा चाहै । आठौ अंग काम के वाहै ॥
वस्त्र भूषण देह शिंगारै । नानाविधि करि रूप सँवारै ॥
करै कटाक्ष बहुतही भारै । वश करने को टोना डारै ॥
काजल भरी आंखसूं जोहै । अंग बिषे रस दै दै मोहै ॥
ह्यांसू निकसन कैसे पावै । चरणदास शुकदेव सुनावै ॥
दो० तिरियाही के जाल में, आय फँसै जो कोय ।
तल्फि तल्फि ह्नांईं रहै, निकसी सकै नहिं सोय ॥
सुत पुत्री बनितासूं जानौं । समधाने वासूं पहिंचानौं ॥
और बँधै बहुतै बँधवार । नाई ब्राह्मण बहु परिवार ॥
सेढ़ मसानी देवी भूत । ग्रह नक्षत्रहु लगै अऊत ॥
चौथ अहोई लागै सौन । तिरिया कारण साजो भौन ॥
औरौ बहुत बखेड़े जान । नारी से तोहीं पहिंचान ॥
महा अपरबल दुख तेहिमाहीं । मरिकै चौरासी में जाहीं ॥