भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 283, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें२४६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ऐसे जगने तू नहिं पकड़ा । चरणदास कहैं नाहीं जकड़ा ॥
दो० छोड़ जक्तकी वासना, यही जु छुटन उपाव ।
ये मन ऐसी धारिये, अबहीं नीको दाव ॥
अबकी चूके चूक है, फिर पछितावा होय ।
जो तुम जक्तन छोड़िहौ, जन्म जायगो खोय ॥
जग माहीं न्यारे रहो, लगे रहो हरिध्यान ।
पृथ्वी पर देहीं रहे, परमेश्वर में प्रान ॥
ज्यों तिरिया पीहरवसै, सुरति पिया के माहिं ।
ऐसे जन जग में रहें, हरिकूं भूलैं नाहिं ॥
ज्यों किरपण बहुदामही, गाड़ि जिमींके नीच ।
सदा वाहि तक्तौ रहै, सुरति रहै ताबीच ॥
तन छूटे हो सरपही, जा बैठे वा ठौर ।
जहां आश तहाँ वास है, कहूँ न भर्मैं और ॥
चितरहै गोविंद के विषे, जग में सहज सुभाय ।
तनछूटै हरिकूं मिलै, चरणकमल लिपटाय ॥
जग त्यागो वैरागले, निश्चय मनकूं लाव ।
आठ पहर साठौ घरी, सुमिरन सुरति लगाव ॥
सबसूं रहु निरवैरता, गहौ दीनता ध्यान ।
अंत मुक्तिपद पाइहौ, जगमें होय न हान ॥
चरणदास यों कहत हैं, बड़ी दीनता जान ।
औरन की तौ क्या चलै, लगे न मायाबान ॥
दया नम्रता दीनता, क्षमा शील संतोष ।
इनकूं लै सुमिरण करै, निश्चय पावैं मोष ॥
ये सब लक्षण राम में, प्रकटत दीखैं मोहिं ।