भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
भक्तिपदार्थवर्णन । २२३
घटो बढ़ो तुम नाहिं सदा पूरन रहो ॥
आदि अंत सब सृष्टि के पुरुष अनन्त जू ।
नितही इकरस रहत तुमही भगवंत जू ॥
जो तुम ऐसी भांति कहो हरि देव जू ।
हमसो उत्पति भई तुम्हारी भेव जू ॥
तुमतो कैसी भांति हमें पहचानई ।
स्तुति ऐसी भांति कैसे के बखानई ॥
दो० ऐसी बुद्धि हमरी भई, तुम्हरे ही परताप ।
हम तो चरणहिं दास हैं, तुमही करता आप ॥
अष्टपदीछन्द ॥
यह सब किरपा नाथ तुम्हारी जानियै ।
ना तो केतिक बुद्धि हमारी मानियै ॥
तुमही सगरी सृष्टि के कारन रूप हो ।
तुम उपजावन पालन मारन रूप हो ॥
ज्यों घट नाना भाँति यों ही संसार है ।
फूटे मांटी होय सभी यों विचार है ॥
ऐसेही इक ब्रह्म सकल व्यापक सदा ।
नाम अनेक कहाय हम बरने कहा ॥
निराकार निरलिप निरगुन करतार हो ।
अपने भक्तन हेत लेत अवतार हो ॥
तुमरी लीला नाथ जो परम सुहाई ।
जो जन कहै और सुनै हिये में लावई ॥
ते जन लहत पुनीत जो पद निरबान कूं ।
अंतकाल तुम्हें मिलत जो ऐसे ज्ञान सूं ॥
तुमरी भक्ति अनन्य जो कोई जन करै ।
ज्ञानस्वरोदय, मनविरक्तकरण एवं धर्मजहाज ग्रन्थ
२२४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जन्म सुफल तिहि होय मुक्ति पर पग धरै ॥
प्रेम मगन ज्यों साधु तेरो गुन गावईं ।
होय सु महाप्रसाद प्रीति सों पावईं ॥
जोगेश्वर चित लाय जू तुमकूं ध्यावईं ।
प्रान वायु कूं खैंच त्रिकुटी लावईं ॥
हृदय कमल के मांह तुमहि कूं देखई ।
अद्भुत रूप सरूप अनूपम पेखई ॥
अगम पंथ भगवान तुम्हारो जानिये ।
कहन शक्त परमान कोउ हिय आनिये ॥
अगम पंथ इह भांति तुम्हारो नाथ जू ।
पहुँच सके किहिं भांति सुनो यह बात जू ॥
भक्ति तुम्हारी नाथ स्मृति वरनन करैं ।
पावैं इस विधि तोंहि प्रीति तुमसों करैं ॥
तुम्हरी भक्ति अनूप हिये में धारई ।
चार पदारथ संत कबहु चाहत नहीं ॥
ऐसे लक्षन होहिं तुम्हारे भक्त के ।
अंतर प्रेम अगाध बाहर जड़ रूप से ॥
मन के मांहीं ध्यान तुम्हारो ही बसे ।
कबहुँ रोव आप कबहु आपहि हंसे ॥
हंसत तुम्हारे ध्यान बहु हरखाय के ।
देख दशा संसार रोवे पछताय, के ॥
कबहु मगन मन होय ध्यान दृढ़ कर गहै ।
साजे तुम्हरी भक्ति जहां चित्त दे रहै ॥
बिना भक्ति कुछ और न जिय में जानई ।
बिरले ऐसे कोय जक्त में मानई ॥
भक्तिपदा २२७
तुम्हरो रूप अरूप
जहाँ कर्म मन वचन
हम हूँ जो पै वेद
तो पै तुम्हरो भेव कह
तुम्हरो रूप अरूप न
पंथ तुम्हारे की देह बताय
ज्ञान भक्ति बैराग्य जु न उपजें ।
तब तुम्हरी पहिचान हिये में नीपजै ॥
दस इन्द्रिन कूँ रोक जु मन के बस करै ।
सो मन अपनी बुद्धि मांझही ले धरै ॥
जब वह अपनी बुद्धि तुम्हीं सो लावई ।
सोई जोगी होय वे साधु कहावई ॥
जो पै नाम प्रकाश तें बहु विधि संचरै ।
भक्ति बिना निर्वान को पद नाहीं लहै ॥
जो पै काल पर्यन्त जो जीवे नर कोई ।
तो भी होवे नाश ब्रह्मा के संगवही ॥
जौपै देवन मांहिं जाय के अवतरै ।
तो भी न छूटैं कर्म मुक्ति घर ना करैं ॥
बेडी लोहे की होहि सोने की जानिये ।
दौंऊ एक समान उहि विधि मानिये ॥
तुम्हरो पुरुष स्वरूप प्रगट जब होय जू ।
ब्रह्मादिक सब देव पूजत में सोय जू ॥
कर कर यज्ञ उपाय जगत के लोय हैं ।
देवन पूजा साज करत सब कोय हैं ॥
स्वर्ग लोक में जाय ताको फल पावई ।
मृत्यु लोकही मांहिं बहुरि फिर आवई ॥
...मीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
२२४ श्री...
...ंग वह निहकर्महीं जो होय है ।
जन्म...
...क पदारथ पंथ न पावत कोय है ॥
विषय भोग रस स्वाद जोई जन पर हरै ।
भक्ति जोग दृढ़ होय जहां मन लै धरै ॥
तुम बिन और न चहै गहै पर नाम को ।
लहै तुम्हारो नाम रहे विश्राम सों ॥
जो नर जग के मांहिं इन्द्रिन के बस रहै ।
कीट योनि के मांहिं जन्म सोई लहै ॥
बहुर लेत जड़ योनि मांहिं अवतारही ।
फिर आवत है पशुकी योनि मझारही ॥
तिहि पीछे नर देह वही जो पावई ।
पहिले ही वह नीच योनि में आवई ॥
बहुरो ऐसे चार चरण में अवतरै ।
ऐसे बिषई लोय बहुत भरमत फिरै ॥
माया तुम्हरी अपार सुचतुर कहावई ।
एकै रूप अनेक भांति दिखलावई ॥
विविध वरन सों होय भासे साकारही ।
उनही रच्यो सब जक्त जहां लौं आकारही ॥
वृक्ष की छाया देख सरोवर नीरही ।
छेरी मन ललचाय आई वा तीरही ॥
वह तो इतनी शक्ति कहां सों पावई ।
जासों ही वह निकट वृक्ष के आवई ॥
या विधि प्रानी सबै माया में डूबई ।
नाहीं तो वह आप काहू व्यापत नहीं ॥
माया ही के माहिं जो कोऊ जन बंधे ।
भक्तिपदार्थवर्णन । २२७
चौरासी के माहिं सदा भरमत रहै ॥
जौं जन मन ते आप माया को परिहरै ।
हरि के चरनों मांहिं ले चित अपनो धरै ॥
परम भक्त जो होय जक्त के मध्य ही ।
जीवन मुक्ति को पाय कछू संशय नहीं ॥
माया ही के संग मोह उन लाइया ।
तिहि कारन नर जीव जु नाम कहाइया ॥
अहंकार के संग सों छूटत हैं जबै ।
परमातम अरु ब्रह्मरूप होवें तबै ॥
मनुष रूप को जन्म दुर्लभ जग मांहिं हैं ।
देवन हूं को कठिन परापत नाहिं है ॥
सकल देव ईहिं भांति मनोरथ नित करैं ।
मनुष जन्म को पाय के भवसागर तरैं ॥
नर शरीर को नवका समझी जानिये ।
वेद पुरानन मांहिं जु साख पिछानिये ॥
सतगुरु खेवट रूप हिये में आनिये ।
या नवकाको पार लगावन जानिये ॥
अलख ईश भगवान जो कृपा निधान है ।
भवसागर के तरन को रूप विधान है ॥
तिन के शरने आय चरणही दास हो ।
प्रेमा भक्ति अनन्य करे निरवास हो ॥
याही विधि सों पार न होवे नर कोई ।
आतम घाती जीव जान लीजे सोई ॥
पुनि चौरासी लक्ष कि योनि मझारही ।
भ्रमत रहत इहिं भांति जु बारंबारही ॥
२२८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दारा सुत अरु बंधु हितू मन आनिये ।
मिथ्या सब व्यवहार जक्त को जानिये ॥
जो जन इन के मांहिं बंधे चित देवई ।
कवहूं मुक्ति न होय जन्म फिर लेवई ॥
मन वच करके प्रीति जो तुमसों साजई ।
कर्म बन्ध कट जांय मुक्ति पुर राजई ॥
तुमरे जन जे लोय जु गिरह को परहरें ।
तुम कारनही नाथ बहुत तीरथ करें ॥
जेते तीरथ होहिं गंग कूं आदि दै ।
तुम चरणोदक होय वहै तीरथ सबै ॥
तुम चरणन के ध्यान मगन निशि दिन रहें ।
तुम्हरी अमृत कथा सुनैं नित सुख लहैं ॥
इहि विधि तुमसों प्रीति सदा जु निवाहई ।
विना भक्ति वे मुक्ति कवहूँ नहिं चाहई ॥
और वस्तु की चाह कहा मन लावई ।
छिन में सबको नाश न कुछ ठहरावई ॥
उनके मनके मांहिं कछू इच्छा नहीं ।
बन में कारन कोन रहै निशि दिन वहीं ॥
तन मनहू की आप कछू उन सुधि नहीं ।
वे तो मृत्यु समान फिरें जग मांहि ही ॥
इहि विधि ऐसी भांति जु कोऊ जन रहै ।
जन्म सुफल तिहि होय जक्त में सुख लहै ॥
विमुख होहिं तुमसों जो प्रानी मूढ़ही ।
पशु समान वे लोय अज्ञानी गूढ़ही ॥
याहि जक्त के मांहिं कर्म नहिं होय जू ।
भक्तिपदार्थवर्णन । २२६
का बिधि तुमरी भक्ति करें सब लोय जू ॥
जब लग तुम्हरी भक्ति हिये नहिं लावई ।
तब लग कैसी भांति मुक्ति पद पावई ॥
कीजै सबही कर्म धर्म की रीतिही ।
याही बिधि भगवान सों उपज प्रीतिही ॥
जब लग भक्ति की रीति न मन में आवई ।
तब लग कर्म की रीति न छोड़ गंवावई ॥
बिधि सों सगरे कर्म सोई नर साजई ।
अंत होय निहकर्म मुक्ति पुर राजई ॥
कर्म भक्ति को त्याग जु कोऊ जन करै ।
घोर नर्क के मांहिं सोई प्रानी परै ॥
जग में मनुष शरीर वृक्ष सम जानिये ।
तिहि ऊपर द्वै पक्षी ही पहिचानिये ॥
एक पक्षी तिही मांहिं ताको फल पावई ।
अतिही दुर्बल छीनि दृष्टि में आवई ॥
दूजो पक्षी कछु न जाको फल लहै ।
मन में अति आनन्द लसत नितही रहै ॥
वसुधा में जो भक्त तुम्हारे कहावई ।
रैन दिवस चित आप तुम्हीं सों लगावई ॥
तिनकूं सगरे देव बहुत भरमावई ।
अष्ट सिद्धि नव निद्धि को लोभ दिखावई ॥
लोभ कर सिध देख निद्धि पर मन वहै ।
भक्ति पदारथ सोय जो कैसी बिधि लहै ॥
अति अद्भुत इहि भांति ब्रह्माण्ड बनाइया ।
सातही तत्त्व के संग सोई लिपटाइया ॥
२३० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पहिले धरती तत्त्व हिये में आनिये ।
ताते दस गुनों नीर जीय में जानिये ॥
बहुर अग्नि अरु पवन और आकाश है ।
षष्ठम् अहम् जु तत्त्व सदा परकाश है ॥
महत्तत्त्व रोसी भांत जु चित में जनिये ।
अष्टम मायारूप सकल पहिचानिये ॥
जो नहिं होत अशक्त जक्त व्यवहार में ।
मन में तुम्हरी भक्ति धरै संसार में ॥
माया के शिर पांव जो धर के भक्तही ।
लोक तुम्हारे मांहिं जाय पहुँचत वही ॥
आदि अंत अरु मध्य संपूरण सकल में ।
घटत बढ़त तुम नाहिं कबहुँ कल विकल में ॥
प्रभु महिमा हम नाथ हिये नहीं जानईं ।
और लोक किहि भांति सोबरन बखानईं ॥
सरगुण स्तुति करि जु यह निरबानही ।
निरगुन रूप अरूप कूं कैसे बखानई ॥
या धरती के रत्न सभी गुन लीजिए ।
तो सरूप गुन सकै न गिनती कीजिए ॥
और बहुत पखंड तुम्हीं माहीं रहै ।
तिनहूँ को हम अंत कछू नाहीं लहैं ॥
तिहि कारन हम करें तुम्हें परनाम हो ।
जय जय श्री भगवान जागो सुखधाम हो ॥
वेद स्तुति इह भांति सबन मन भाइ है ।
सकल ऋषिन को भाष जु सनक सुनाई है ॥
तबै सकल ऋषि चाव सों मिल पूजा करी ।
भक्तिपदार्थवर्णन । २३१
बेद स्तुति भलि भांति सो लैकर चित धरी ॥
श्री नारायण बचन कहै इस रीति सों ।
नारद श्रोता भये अधिकहीं प्रीति सों ॥
श्री नारद वह कथा सकल मनभावती ।
वेदव्यास सूं कही जु अधिक सुहावती ॥
जैसी विधि जेहि भांति जो तिन सों हम सुनी ।
वाही विधि वाही रीति सों तुम आगे भनी ॥
ऐसे कहि शुकदेव परिक्षित राजसों ।
भाषा कर मैं कही मुक्ति के काज कों ॥
सब मिलि सुनियो संत बिबेक विचारियो ।
भक्ति हिये में राख आन सब डारियो ॥
भक्ति किये बस होय जक्त करतारही ।
ब्राह्मण शुद्ररु पुरुष करो कै नारही ॥
साधु सती अरु सूर बहुत दाता भये ।
इन की नाहीं जात चरनदासा कहै ॥
यह स्तुति जो कहै सुनै चित लायकै ।
सतसंगति लहै बास जो अघहि नसायकै ॥
समझ धरै मन मांहिं मुक्ति सोई पावई ।
भवसागर दुखरूप जहां नहीं आवई ॥
दो० वेद स्तुति पूरी करी, भेद दिया गुरुदेव ।
चरनदास के शीश पै, सदा रहो शुकदेव ॥
इति श्री भाषावेदस्तुति ॥
श्रीमदाचार्य्यवर्य्य श्यामाचरणदासजी रचित संपूर्णम् शुभम् ।
श्रीराधाकृष्णार्पणमस्तु ॥
—:०:—
३७
२३२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ चीर हरण लीला ॥
( पद ) पैयां लागूं मोहन प्यारे दीजे म्हारो चीर, जाड़ो
लागै छैजी म्हांने जमुना के तीर । कहां सीखे ऐसी टेव अहो
बलवीर, हम अबला ठाढ़ी नगन शरीर ॥ कदम के ऊपर बैठे
बसन चुराय, माखन लै लै खाते हम सों सौ सौ हाहा खाय ।
विनती करते अति शीश नवाय, रखिये अब लाज हमारी
हूजिये सहाय ॥ तब बोले अंतरयामी अंतर उधार, लै लै
जावो वस्त्र अपने एहो ब्रजकी नार । प्रेम की भक्ति करी तुम
सुकुमार, प्रेम के आधीन फिरों भक्तन के लार ॥ अपनो भायो
कियो प्यारे श्याम सुजान, वस्त्र देदीने सखी छाड़ी कुलकी
कान । तन मन माहीं रमें कृष्ण भगवान, प्रीति की परीक्षा
करी नंद जू के कान ॥ यशोदा को छैया श्याम भैया बलदेव,
मानलई सत्य प्रीति सखियन की सेवा । हरि की लीला कही
शुक मुनि देव, चरनदास सखि पायो निज भेव ॥
अथ श्रीशुक मुनिराज अष्टक प्रारम्यते
पोडशवर्ष किशोर मूरति श्याम वरण दिगम्बरम् ।
घूँघरवाले केश झलके शुकमुनि चरण प्रणमहं ॥
पद्म आसन उद्र त्रिवलीं चरण पंकज शोभितं ।
आजानु भुज मुसकात मुखसों शुकमुनि चरणप्रणमहं ॥
गूढ़ यंत्र विशाल उर छबि नाभि गंभीर राजितं ।
जलजलोचन सुखदनासा, शुकमुनि चरण प्रणामहं ॥
व्यासनंदन भक्तवंदन मोह ममत्व निकंदनं ।
काम क्रोध मद लोभ न जिन में शुकमुनि चरणप्रणामहं ॥
ब्रह्मरूप अनूप मुनिबर पराशर कुल भूषणं ।
कृष्ण चरित पुनीत वरणत शुकमुनि चरणं प्रणामहं ॥
त्रिभुवन उजागर कृपासागर द्वंद संकट मोचनं ।
प्रेम मदमाते रहें नित शुकमुनि चरण प्रणामहं ॥
निरालम्भ निहभर्म निशि दिन स्थिर बुद्धि निकेतनं ।
धर्मधारी ब्रह्मचारी शुकमुनि चरण प्रणामहं ॥
पतितपावन भर्म नशावन शरणागत सुखदायकं ।
मायाजीतं गुणातीतं शुकमुनि चरण प्रणामहं ॥
श्रीशुकदेव अष्टक परम सुन्दर पठत पाप नशायकं ।
चरणदास शुकदेव स्वामी भक्ति मुक्ति फलदायकं ॥
इति अष्टक ॥
अथ मोह छुटावन अंग वर्णन ॥
कुंडलिया ॥
भक्ति दृढ़ावनकूं कहे नानाही परसंग ।
शुकदेव कृपा सों अब कहूं मोहछुटावन अंग ॥
मोह छुटावन अंग कोई हियमाहीं धारै ।
कुटुँब जालसुं छूटि लगै हरिचरणौ लारै ॥
चरणदास यौं कहत हैं उपजै मन वैराग ।
जक्त नींदही सूं खुलै चौथे पदमें जाग ॥
दो० गुरू पूजि जग छोड़िये, भवसागर के द्वन्ध ।
साधुनकी संगति करौ, तजौ जाति कुलबन्ध ॥
बन्धु नारि सुत कुटुँब सब, यमकी फांसी जान ।
तोहिं छुटावैं रामसूँ, इनका कहा न मान ॥
खैंचि पकड़ि ह्वां राखिहैं, जहां मोह का जाल ।
जीवत दुख बहु भांतिके, मुये नरक ततकाल ॥
या प्राणीकूं ठग लगै, सकल कुटुँब परिवार ।
२३४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तिनमें दो बलवन्त हैं, एक द्रव्य इक नार ॥
नारि किये दुख बहुत हैं, बन्धन बँधै अनेक ।
जो सुख चाहै जीवका, तिरियाकूं मत पेख ॥
द्रव्य माहिं दुख तीन हैं, यह तू निश्चय जान ।
आवत दुख राखत दुखी, जात प्राणकी हान ॥
ताते इनकी प्रीति मन, उठै तभी निरवार ।
ये दुर्जन दुख रूप हैं, ऐसो करो विचार ॥
जो कोई इनमें पगै, तिन सें छूटै राम ।
चरणदास यों कहत हैं, क्यों पावै हरिधाम ॥
हेरि फेरि धनको करत, बीतै पहर इकरात ।
तीनपहर निशिके रहैं, खोवै नारी साथ ॥
नारी के फैलाव को, दीखै ओर न छोर ।
द्रव्य माहिं तृष्णा रहै, चाहै लाख किरोर ॥
द्रव्य जोरि मरिजय जब, हो बैठे तहँ नाग ।
नारी में जो चित रहै, ह्वैहै कूकुर काग ॥
ऐसेही भरमत फिरै, लख चौरासी देह ।
कनक कामिनीकूं तजै, जबलग नाहीं नेह ॥
मूरख त्याग न करिसके, ज्ञानवन्त तजि देह ।
चौंकायल मृग ज्यों रहै, कहीं न साजै गेह ॥
जो कोइ छोड़ै कुटुंबही, ऐसी कर पहिंचान ।
जैसे छूटै बन्ध सूं, यम जोरासूं जान ॥
जीवत यम तौ कुटुंब है, घेरि घेरि दुख देय ।
ऐसे मानुष देहकूं, लूटै ही नित लेय ॥
कै ठग सबकूं जानिये, कै धाड़ी के चोर ।
भक्तिपदार्थवर्णन । २३५
रणजित कहै तु देखले, लूटत हैं निशि भोर ॥
बाहर कलकल करत हैं, भीतर लावहिं लाव ।
ऐसो बांधौ खैंचकरि, छुटै हाथ नहिं पाव ॥
लाजतौंक गलमें पड़ा, ममता ,बेरी पांय ।
रसरी मूरुख नेह की, लीन्हे हाथ बँधाय ॥
डारि दियो अज्ञान में, परो परो बिललाय ।
निकसनकूं जबहीं चहै, कुतका मोह लगाय ॥
रखवारे जहँ पांच हैं, इन्द्रिन के रस जान ।
तबहीं देह भुलायकै, जो कुछ उपजै ज्ञान ॥
कुटुँब ओर इन पांच को, एक मतोही जान ।
प्राणी कूं जग में फँसा, चहै खान अरु पान ॥
ये सब स्वारथही लगें, इसका सगा न कोय ।
जो शिर मार धरणि पर, कल्प कल्प करि रोय ॥
मात पिता सुत नारि की, इनकी उलटी रीति ।
जग में देह फँसाय कै, करिकै प्रीतिहि प्रीति ॥
जैसे बधिक बिछाय कै, जाल माहिं कण डार ।
प्रीति करै पक्षी गहै, पाछे करै जु खार ॥
जैसे ठग बहु प्यार करि, भोलापनहीं देह ।
पहिले लडू खवाय कै, पाछे सरबस लेह ॥
हित सूं हिरण बुलाय कै, गोली मारै तान ।
चरणदास यों कहतहैं, ऐसे इन कूं जान ॥
जलमें बंशी डारिया, अटकाया जहाँ मास ।
मछरी जानै हित कियो, लखो न अपनो नास ॥
भोंदू यह गति ना लखी, पड़ो कुमति के फंध ।
२३६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ज्यों की त्यों सूझी नहीं, किया मोह ने अंध ॥
सब ठग यह देखी नहीं, कपट हेत नहिं जान ।
इनही में मिलकर चलौ, समझौ ना अज्ञान ॥
अब इनके छल कहत हूँ, समझै होय उदास ।
जानै ना द्वाई रहे, कहै चरणही दास ॥
अब इनके छल कहि समझाऊं । भिन्न भिन्न परगट दिखलाऊं ॥
पिता कहै तुम पुत्र हमारे । बहुत भरोसे मोहिं तुम्हारे ॥
अब तुम ऐसी बिद्या पढ़ो । अपने कुल में ऊंचे चढ़ो ॥
सतसंगति में कभी न जइये । अपने घर में चित्त लगइये ॥
हम तो हैं दुनियां के क्रूते । जाति वरण में होहिं सपूते ॥
कृत्य करो पालौ सुत वाम । कथा कीरतन सूं क्या काम ॥
अब तुम ठौर हमारी हूजै । हमने किये सो तुमहूँ कीजै ॥
ऐसी बुद्धि बड़ाई दीन्ही । इनहू हिरदय में धरि लीन्ही ॥
चरणदास कहैं देखो प्यार । मुये नरक जीवितहौ ख्वार ॥
दो० पिता बुद्धि ऐसी दई, रहिये कुटुंब मंझारि ।
जो कुछ है सो जक्तमें, धन सम्पति सुत नारि ॥
हरिकी राह भुलाय करि, दोन्हो कुटुंब चिताय ।
ताते दुख जगमें घने, चौरासी भरमाय ॥
अब सुन माताहू की वातैं । अपना जान खियावै तातैं ॥
द्रव्यकाज उद्यमहीं कीजै । ला माता की गोदी दीजै ॥
करै कमाई सोई सपूता । नाहीं तौ वह पूत कपूता ॥
नारी कूं भूषण पहिनावो । सुत पुत्री को ब्याह रचावो ॥
पूजौ पित्तर देवी देवा । सकल कुटुंब की कीजै सेवा ॥
अपने कुलकोन्योति जिमावो । ताते बहुत बड़ाई पावो ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । २३७
बहु विधि स्वारथही सिखलावै । परमारथ की राह भुलावै ॥
बारबार जग में उरझावै । ऐसे तौ नितही चलि आवै ॥
जितका तितह्नांईं रखि लीन्हा । चरणदासकहें जान न दीन्हा ॥
दो० माताहू ने प्यार करि, बहुत दिया शिरभार ।
यही जो नीको धारियो, महल द्रव्य सुत नारि ॥
अब नारिकी गति सुनि लीजै । तामें चित्त कबहुँ नहिं दीजै ॥
छल बलकरि वश अपने राखै । मधुर वचन रससने जु भाखै ॥
कहै कि शिर के छत्र हमारे । हम तौ लागीं शरण तुम्हारे ॥
तुमतौ बहुतै लगौ पियारे । मोकों तजि मत हूजो न्यारे ॥
ऐसे कहि कहि बांधा चाहै । आठौ अंग काम के वाहै ॥
वस्त्र भूषण देह शिंगारै । नानाविधि करि रूप सँवारै ॥
करै कटाक्ष बहुतही भारै । वश करने को टोना डारै ॥
काजल भरी आंखसूं जोहै । अंग बिषे रस दै दै मोहै ॥
ह्यांसू निकसन कैसे पावै । चरणदास शुकदेव सुनावै ॥
दो० तिरियाही के जाल में, आय फँसै जो कोय ।
तल्फि तल्फि ह्नांईं रहै, निकसी सकै नहिं सोय ॥
सुत पुत्री बनितासूं जानौं । समधाने वासूं पहिंचानौं ॥
और बँधै बहुतै बँधवार । नाई ब्राह्मण बहु परिवार ॥
सेढ़ मसानी देवी भूत । ग्रह नक्षत्रहु लगै अऊत ॥
चौथ अहोई लागै सौन । तिरिया कारण साजो भौन ॥
औरौ बहुत बखेड़े जान । नारी से तोहीं पहिंचान ॥
महा अपरबल दुख तेहिमाहीं । मरिकै चौरासी में जाहीं ॥
२३८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ताते हूजे बेगि उदास । समुझितजौ तिरियाकी आस ॥
कहि शुकदेव चरणहीं दासा । सभी कुटुंब है नरक निवासा ॥
दो० सुतकी बोली तोतली, करै चोचले चाव ।
मन मोहै बाँधै घनो, छूटे को न उपाव ॥
हँसि गोदी में आयकरि, बहुत बढ़ावै नेह ।
तामें घने विकार हैं, अन्तकाल दुख देह ॥
मोह लगा मरजाय जब, तन मन लागै आग ।
चरणदास यों कहतहैं, सुख चाहै तौ त्याग ॥
जिहिकारण चिन्तालगे, जवलग घटमें प्रान ।
हरिगुरु हिये न आवई, यही जु पूरी हान ॥
तन छूटै सुत में रहै, एक नर तेरी आस ।
जनम जु शूकर को लहै, मुये नरकही जास ॥
कुटुंब बंध ऐसे करि जानौ । फांसीगर तिनकूं पहिंचानौ ॥
तोकूं डारै नरक मँझारा । ताते होहि सबन से न्यारा ॥
बहुतक दुर्जन हैं घटमाहीं । तू उनकूं जानतहै नाहीं ॥
हैं वैरी तू जानत मीता । स्वप्नेहूँ इनकी नहिं चीता ॥
काम क्रोध लोभ अरु मोहा । सबहीं राखैं तोसूं द्रोहा ॥
जिनसे गर्व मछरता भारी । जक्त वड़ाई तिनकी नारी ॥
आपा लिये सदाहीं रहै । टेढ़े वचन झूठ बहु कहै ॥
इनके संग घनेही दृष्टी । तेरे तन में रहैं अहष्टी ॥
नितही करै अकारज तेरा । चरणदास कहैं यहविधि घेरा ॥
दो० बहु वैरी घट में बसैं, तू नहिं जीतत कोय ।
निशिदिन घेरेही रहैं, छुटकारा नहिं होय ॥
जो कहुं निकसि बाहर आवै, अरु विरक्त का रूप बनावै ॥
भक्तिपदार्थवर्णन २३६-
कुटुंब छोड़ उपजै बैराग। जक्त रहा चरणों से लाग ॥
कछू वासना मनमें धँसी। जबहीं लोक बड़ाई हँसी ॥
पुष्ट भयो आपा अभिमान । सहजहि आया मोह दिवान ॥
सबही संगी लिये बुलाय । या विरक्त कूँ घेरो आय ॥
ताकूं बांधि मुरंडा कीन्हा। फेरि कुटुंब के माहीं दीन्हा ॥
कुटुंब मित्र गाढ़ा करि बांधा। बड़िवड़ि आंखौँ ऐसा आंधा ॥
चरणदास कहैं घरमें आया। घट के दुर्जन वाहि बँधाया ॥
दो० कुनवे में से निकसि करि, फिर कुनबे में जाय।
निश्चय नरकी होयगा, दुनियां में दुख पाय ॥
एक तपोवन में जा रहा। शीत उष्ण पावस शिर सहा ॥
सूखे पातों किया अहारा। छूटे सबही जग व्यवहारा ॥
रहै ध्यान में निशिदिन लागा। हरिके चरण कमलमें पागा ॥
महिमा सुनि राजा तहँ आया। दे परिक्रमा शीश नवाया ॥
हाथ जोरि ठाढ़ो फिरि भयो। तपसी मुख ना बैठन कह्यो ॥
ठाढ़े भये बार बहु भई। तब राजा ने मनमें कही ॥
यह तपसी है बहु अभिमानी । मोआवन महिमा नहिंजानी ॥
ऐसी कहि मनमाहीं ऐंठा। आपहि आप भूप वह बैठा ॥
दो० जो हरिके रँग में रँगे, भूपन सूं क्या काम ।
चरणदास कुछ भय नहीं, ना कुछ चाहिये दाम ॥
तपसी कछू न मुखसूं भाषा। राजाउठि चढ़ि मारग लागा ॥
क्रोध भरा महलन में आया। खोंटा मनमें मता उपाया ॥
पातुरि भेजि वाहि अजमाऊं। भेद झूठ सांचे को पाऊं ॥
जबहीं पातुरि लई बुलाई। ये बातें वाकूं समझाई ॥
कहै पातुरी आज्ञा दीजै। देखि तमाशा वाका लीजै ॥
आयसु लै पातुरि घर आई। प्रथममें लौंडी एक पठाई ॥
२४० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
वा तपसी का लावो भेद । कौन वस्तु से वाको हेत ॥
कहा सुभोजन करै अहारा । छुटै भजन सूं कौनी बारा ॥
बांदी गई भेद सो लाई । पातुरि कूं सब बात सुनाई ॥
दो० झारै जा मुख धोयकै, फिरि तलाव में न्हाय ॥
चरणदास फलपात जौं, गिरे पड़ेही खाय ॥
पातुरि सुनि मनमें डरपाई । कैसे वाकूं वश करुं जाई ॥
बिन वश किये भूप नहिं रीझै । काढ़ि नगर सूं बहुतै खीझै ॥
ताते मकर पेंच कछु कीजै । तपसी का मन करमें लीजै ॥
जो कहुँ इच्छा नेकहु पड़ये । छलबल करि वामदन१ जगइये ॥
यह विचार पातुरि जब कियो । नानाविधि भोजनकरिलियो ॥
गई तहां तपसी अस्थान । वहतौ करत हतोहरि ध्यान ॥
बैठ रही धीरज उर धारि । जबलग उठे ध्यान निरवारि ॥
उठे ध्यानते आंखें खोली । करिदण्डवत नारियों बोली ॥
पुत्र नहीं हमरे घरमाहीं । जिस कारण दर्शन कूं आई ॥
यह कहि भोंजन आगे राखा । तपसी भोंजन लिया न भाखा ॥
वादिन तौ योंही उठिआई । अंगुली टिकन ठौर नहिंपाई ॥
दूजे दिन गइ बहुत सबारा । न्हाकर आये थे उंहिबारा ॥
कहा कि भोजन हमरा कीजै । हमरे नैनन को सुख दीजै ॥
तपसी कहै न चित्त डुलाऊं । सूखे पात और फल खाऊं ॥
पातुरि कहै दूर सूं आई । तुमतौ दयावंत सुखदाई ॥
यही मान मेरो तुम राखो । बहुत नहीं अंगुली भरिचाखो ॥
कहिकरवचन वाहिपघिलाया । अंगुलीभरि भोजन चटवाया ॥
चाटत चाटत चाटत रहा । रणजीत कहैंयोंमनवहिगया ॥
१ काम ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । २४१
दो० पातुरिने कर जोरि करि, बहुरौ वचन सुनाय ।
एकवार अरु लीजिये, इन्द्रीजित ऋपिराय ॥
फिरि भारी अँगुली भरि लीन्हा । बहुरौ मुखके माहीं दीन्हा ॥
अँगुली टिकन कामकरि आई। घर आकर बहुतै हुलसाई ॥
फिर ह्वां दिना चार ठहराई । उत नहिं गई यही मन आई ॥
पातुरि चतुर ढील सूं गई । तपसी कही कहां तुम रही ॥
जबहीं पातुरि प्रीति पिछानी । अपनी कला पैठती जानी ॥
वादिन व्यंजन कछू न लाई । बहुविधि भोजन बात सुनाई ॥
घर ठाकुर सेवा चित लाऊं । नानाविधि के भोग लगाऊं ॥
लै आज्ञा निज भवन पधारी । चरणदास कहैं छल कियो नारी ॥
दो० तपसी कूं जीतन कियो, टेक बांधि करि वाद ।
हौरै हौरै लाय हूं, या जिह्वा के स्वाद ॥
नानाविधिके स्वादकरि, लैगई वाही पास ।
कह्यो कि यह परसाद है, लीजै कोई ग्रास ॥
ठाकुरको प्रसाद जु लीजै । याको नाहीं कबहुँ न कीजै ॥
नाहीं किये होय अपराध । तुमतौ कहियो पूरे साध ॥
कछुक पातुरि वचन सुनायो । कछुक तपसी के मन आयो ॥
डारौ हाथ थार के माहीं । ज्यों ज्यों खात सराहत जाहीं ॥
पातुरि कहो सदा लै आऊं । जो जो ठाकुर भोग लगाऊं ॥
यामें कछू दोष नहिं लागै । तन मनका सब पातक भागै ॥
वाकूं वश करिकै घर आई । सखियन कूं यह कथा सुनाई ॥
कामदेवकी सौगंद खाऊं । तपसी बँधुवाकरि दिखलाऊं ॥
दो० रसनास्वादहिवश किये, मनमें जीतन वाद ।
कभी आप बांदी कभी, पहुँचायाँ परसाद ॥
२४२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
कबहुँ वा तपसी ढिग जावै । नानाविधि के भोजन ख्वावै ॥
कबहुँ भेजै बांदी हाथा । कहियो छुट्टी मोहिं न नाथा ॥
वह जानै मम सेवा करै । यह तौ भजन तपस्या हरै ॥
एक दिना पातुरी ह्वां गई । हाथ जोरि भाषत यों भई ॥
कहो कि मेरे भवन पधारो । करो पवित्र जूंठनि डारो ॥
लावन की बहु बात बनाई । सो तपसी के मन नहिं भाई ॥
ह्वांई रही टोना सो कीन्हो । तपसीको मनवशकरिलीन्हो ॥
दूजे रस की कला दिखाई । मोह बढ़ो अरु आँख लजाई ॥
भोरभये फिर बात सुनाई । छलबल करि घरही लै आई ॥
चरणदास तपसी नहिं जानी । अजहूं ठगनी ना पहिचानी ॥
दो० घरमें ला बहु सुखदिया, दिना आठही राखि ।
तपसीहू वा वश भयो, पांचन सूं रस चाखि ॥
इन्द्रीवश पातुरि घर आया । अपने तपका तेज घटाया ॥
सिमटामन भया फूटक फूटा । लागा ध्यान रामका छूटा ॥
देखै घरके वैरी किया । पकड़ बांधि और कर दिया ॥
फिर पातुरि राजापै गई । तपसी ठगन बात सब कही ॥
नेक नेक सब समझाई । तब राजाकूं हांसी आई ॥
योंहीं कही वेगि लै आवो । वाकी सूरत हमैं दिखावो ॥
फिर पातुरि उलटीही धाई । तपसी कूं इक बात सुनाई ॥
राजा दर्शन करन बोलावै । जितसेती खाने कूं आवै ॥
वाकूँ चलकरि दर्शन दीजै । किरपा प्यार बहुतही कीजै ॥
हमतौ उनकी सदा कहावैं । नितउठिकरि मुजरेको जावैं ॥
ह्वांतौ अपना घरही जानौ । उठिये चलिये सकुच न मानौ ॥
पाछे तपसी आगे बाला । ऐसे राज दुआरे चाला ॥