भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
भक्तिपदार्थवर्णन । २०५
यह माया सबकूं मोहै। वस होय न ऐसा कोहै ॥
यह बहुत सोहनी लागै। सबही नरनारी पागै ॥
कहिं चमक दमक बहुरूपा। अरु कहीं रंक कहिं भूपा ॥
अरु जहँ तहँ अधिक तमासे। वह भांति भांतिही भासे ॥
अरु जहँ लग सकल सवादा। कोइ करै जु वाद विवादा ॥
अरु काम क्रोध मोह लोभा। अरु मान बड़ाई शोभा ॥
अरु पांचौ इन्द्री जानौ। सब माया रूप पिछानौ ॥
अरु पांच¹ तत्त्व गुण तीनौ²। सो माया ही कूं चीन्हौ ॥
वह मकर पेच छले जानै। अरु पहर पहर बहुबानै ॥
गुरु शुकदेव जनावै। सब माया खेल दिखावै ॥
दो० जेते सुख संसार के, सबही माया जार।
तामें दो कणका धरे, एक द्रव्य एक नार ॥
लालच लागै चावसूं, गिरे आय करि लोय।
फँसे आपसूं आपही, गहि नहिं लाया कोय ॥
पांचौ इन्द्री सों लखै, सो माया आकार।
याहीसेती सब भयो, जहाँ लगहै साकार ॥
अरु माया रूप अनन्ता। कोइ जानै साधू सन्ता ॥
कहा सुना अरु देखा। सब माया रूप विशेखा ॥
आठ सिद्ध नौ माया। जहाँ जोगी तपी भुलाया ॥
अरु माया फंदे मांहीं। सब जीव आइ फँसि जाहीं ॥
वै नरक माहिं दुख पावैं। यम छप्पन त्रास दिखावैं ॥
फिर भुगतै लख चौरासी। वे गरभ योनि के वासी ॥
वे पशू देह धरि धावैं। नहिं मुक्त ठिकाना पावैं ॥
चरणदास कहैं नर चेतौ। तजौ मायाही सूं हेतौ ॥
१ पृथ्वी अप् तेज वायु आकाश २ सात्त्विक राजस तामस ॥
२०६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० जगत बासना के तजे, माया की न बसाय ।
कर्म्म छुटै मिटै जीवता, मुक्तरूप हो जाय ॥
फँसे न इन्द्री स्वाद में, चरणकमल में ध्यान ।
पर आशा कोइ नारहै, लगै न माया बान ॥
सबमें अधिकी ज्ञान है, तासे ऊंचो ध्यान ।
ध्यान मिलावै पीवकूँ, पावै पद निरवान ॥
ध्याता ध्येय कैसे मिलैं, होय न विचमें ध्यान ।
तीनौ एक हुये बिना, लहै न पद निरवान ॥
इन्द्रिन के वश मन रहै, मनके वश रहै बुद्ध ।
कहौ ध्यान कैसे लगे, ऐसा जहां विरुद्ध ॥
जित जित इन्द्री जातहैं, तित मनकूँ लेजात ।
बुधिभी संगहि जात है, यह निश्चयकरि बात ॥
जित इन्द्री मनहूं गया, रही कहाँसूं बुद्धि ।
चरणदास यों कहत हैं, करि देखो तुम शुद्धि ॥
इन्द्री मनके वश करै, मन कर बुधिके संग ।
बुधि राखै हरि पद जहाँ, लागै ध्यान अभंग² ॥
इन्द्री मन मिल होत है, विषय वासना चाह ।
उपजै जैसे कामही, नारी मिल अरु नाहँ³ ॥
न्यारे न्यारे तत रहें, होत न कछू उपाध ।
जुदे राखमन इन्द्रियन, गुरुगम साधन साध ॥
इन्द्रीसूं मन जुदाकरि, सुरत निरतकरि शोध ।
उपजै ना विप वासना, चरणदास को बोध ॥
इन्द्री रोकेते रुकै, और जतन नहिं कोय ।
मन चंचल रिझवार है, रसिक सवादी सोय ॥
१ बैर २ जो भंग न हो ३ पति ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । २०७
चंलौ करै थिर ना रहै, कोटि यतनकरि राख ।
यह जबही वश होयगा, इन्द्रिन के रस नाख ॥
न्यारे न्यारे चहतहैं, अपने अपने स्वाद ।
इन पांचौमें प्रीति है, कछू न वाद विवाद ॥
दुर्जन के फूटे बिना, तेरी होय न जीत ।
चरणहिंदास विचारिकरि, ऐसी कहिये रीत ॥
जुदी जुदी पांचौ कहौं, एक एक का भेद ।
जो कोइ इनकूं वशकरै, सबही छूटै खेद ॥
यह इन्द्री आंख विचारो । सो देत महा दुख भारो ॥
वह रागद्वेष उपजावै । अरु हरष शोक लै आवै ॥
सो रूप माहिं फँस जावै । तन मन में व्याधि उठावै ॥
वह देह औरके हाथा । करि डारै बहुत अनाथा ॥
वह फंदे माहीं डारै । अरु काम अगिनि में जारै ॥
यह डोलै दौरी दौरी । करचित बुधिकी गति औरी ॥
कोइ साधु शूरमा मोड़ै । जग सेती नैना तोड़ै ॥
कहैं चरणदास सुनि लीजै । कछु याका यतन करीजै ॥
दो० दीपक त्रिया निहारि करि, गिरै पतंग¹ ज्यों जाय ।
कछू हाथ आवै नहीं, उलटी आप जराय ॥
उन तन मन सभी जराया । कछु भोंदू हाथ न आया ॥
अरु विषय वासना फैला । जब छुटा रामका गैला² ॥
तौ मुक्ति कहां सों होई । दिया जन्म अकारथ खोई ॥
अब क्या शिरमारै कोई । घरहीं में दुर्जन सोई ॥
यह दृष्टि सदा की वैरी । जो सुरत बिगारै तेरी ॥
वह माया मोह लगावै । अरु चौरासी भरमावै ॥
१ पांखी २ रास्ता ॥
२०८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
शर्म सकुच सब खोवै । अरु बीज कुबुधि का बोवै ॥
यह ठग चोरी की बानी । अरु जार¹ करम अगवानी ॥
यह पानप सभी घटावै । यमपुर के त्रास दिखावै ॥
कहैं गुरू शुकदेवा । ये आंख महादुख देवा ॥
दो० ऐसी इन्द्री आंख की, सो अपनी नहिं होय ।
गुरु शुकदेव बतावई, चरणदास सुन लोय ॥
दर्शन कीजै साधु का, कै गुरु का कर लोय ।
जहाँ तहाँ ब्रह्म देखिये, दुबिधा दुर्मति खोय ॥
बैरी भिंतर एकै सा, एके रूप कुरूप ।
एसी होवै दृष्टिही, जब समझै मन भूप ॥
सुन दूजै इन्द्री काना। सो गुरु परतापै जाना ॥
जब सुनै काम रस रीता । तब भूलै पढ़ सुन गीता ॥
मन उपजै काम तरंगा । जब होत ध्यान में भंगा ॥
फिर लोभ बचन सुन औरै । जब तृष्णा चहुँदिशि दौरै ॥
कहिं द्रव्य हाथ लगि जावै । यों शोचि शोचि दुख पावै ॥
कहै ठग चोरी कर लाऊं । कहिं गड़ा दबाहो पाऊं ॥
काहू सुनै जु दौलत बंधा । मनही मन रोवै अंधा ॥
यों उपजै अधिकी लोभा । जब बढ़ै पापको गोभा ॥
कहैं चरणहिंदास विचारी । सुन चेतौ नर अरु नारी ॥
फिर सुनै बड़ाई कुल की । जब पुलक हंसत है मुलकी ॥
जो अपनी सुनै बड़ाई । जब अहूँ होत अकड़ाई ॥
फिर करन बड़ाई लागै । सोतां ज्यों कूकुर जागै ॥
जब उपजै बहु अभिमाना । अरु नेक न होवै नान्हा ॥
पर निन्दा बहुत सुहावै। नहिं और बड़ाई भावै ॥
१ छिनारा ॥
⁕ भक्तिपदार्थवर्णन । २०६
अहंकार बढ़ा मन माहीं। आधीन विना गति नाहीं ॥
सुनि उपजै तामस अंगा। जब करै बहुतही दंगा१ ॥
मन क्रोधरूप हो जावै। उठ उठकर मारन धावै ॥
कभी सुनै मोह के बैना। लगै हर्ष शोक दुख दैना ॥
जब सुनै कुटुंब की नीकी। तब करे खुशी बहु जीकी ॥
कोइ कुटुंब माहिं दुख पावै। सुन रोरो नैन गवाँवै ॥
जो हिरन कानवश हुवा। तौ तीर लाग करि मूवा ॥
शुकदेव कहैं यह जानौ। सब कान विकार पिछानौ ॥
दो० मन दै सुनिये हरि कथा, सुनिये हरियश कान ।
ताहि विचारिजु कीजिये, होय भक्ति का ज्ञान ॥
उपजै ज्ञान भक्ति अरु योगा। सुन सुन उपजैराम वियोगा ॥
उपजै प्रेम अनन्य उमाहा। होय उछाह दरशका चाहा ॥
सुन सुन उपजै लक्षण साधू। सुन २ पावै भेद अगाधू ॥
उपजै साधु संतकी सेवा। गुरुमुख होय सुनै यहि मेवा ॥
सुनि २ उपजै भय अरु लाजा। सोवै सकल सँवारन काजा ॥
सुनि सुनि यती सती हो जावै। न्हाहो अभिमान नशावै ॥
सुनि सुनि छूटै यमकी त्रासा। चौरासी में सहै न बासा ॥
सुनि सुनि चार पदारथ पावै। आवागवन के बीज जरावै ॥
सुनि सुनि काग हंस होजाई। चरणदास शुकदेव बताई ॥
दो० सुनि २ उपजै सुबुधिही, लागै हरिका रंग ।
सुनिसुनिउपजैकुबुद्धिही, खोटी उठै तरंग॥
ऐसी इन्द्री कानकी, जाके युगल सुभाव ।
कथा कीरतनहीं सुनौ, करि २ कोटि उपाय ॥
१ फिसाद ॥
२१० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
वचन सुनो गुरु साधुके, मनकूं लावो मोर ।
विषय वासनासूं निकस, आवै हरिकी ओर ॥
सरवन इन्द्री में कही, दोनों अंग दिखाय ।
जिह्वा इन्द्री कहत हैं, चरणदास चितलाय ॥
कुटिल जु इन्द्री जीभकी, चाहे षटरस स्वाद ।
यावश हो अवगुण करै, जन्म जाय बरबाद ॥
यह बहुत चटोरी कहिये । याही ते डरते रहिये ॥
यह चोरी भी करवावै । यह पकड़ बन्ध में पावै ॥
करै याही कारण जारी । यह करे बहुतही ख्वारी ॥
यह अपलें खान सिखलावै । अरु गाली मार दिलावै ॥
अरु बहुते झूठ बुलावै । हो मीत नरक लेजावै ॥
खेलै याही कारण जुवा । दुनियां में फिट फिट हूवा ॥
ये पांचौ ऐब सुनाऊं । रसना में सभी दिखाऊं ॥
यह महा अपरबल जानौ । अरु रणजीता हो मानौ ॥
दो० जिह्वा के जीते विना, गये जन्म सब हार ।
चरणदास यों कहत हैं, भये जगत में खार ॥
बंशी डारी ताल में, मछरी लागी आय ।
जिह्वाकारणजियदियो, तलफितलफि मरि जाय ॥
तजा न जिह्वा स्वादकूं, वा संग दीन्हे प्रान ।
जो कोइ ऐसा जगत में, सो अज्ञानी जान ॥
यासूं ले हरनामहीं, गुणावादही भाख ।
जो बोलै तौ सांचहीं, नाहीं मुखमें राख ॥
मीठा वचन उचारियो, नवता सबसूं बोल ।
हिरदैमाहिं विचारिकरि, जबमुख बाहरखोल ॥
१ नम्रता ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । २११
बिना स्वादही खाइये, राम भजन के हेत ।
चरणदास कहै शूरमा, ऐसे जीतौ खेत ॥
जिन जीतौहै जीभकूं, जिन जीती सब देह ।
कहै गुरू शुकदेवजी, मुक्तिधाम फल लेह ॥
रसना जीतै भक्ति जो, सो योगी सो साध ।
अगम पन्थ मांह पगधरे, पहुँचै देश अगाध ॥
त्वचा सुइन्द्री काम की, नितही खेलें दाव ।
पशुपक्षी असुरा नरा, फँसे आपकरि चाव ॥
यह त्वचा सु मल मल मांजै । अरु काजल सुरमा आंजै ॥
यह तेल फुलेल लगावै । अरु चिकना गात बनावै ॥
अरु बस्तर भूषण पहिरै । करै अंजन मंजन गहिरै ॥
अरु लपटस की विधि ठानै । सव याही कूं सुखमानै ॥
अरु फँसे आय करि दोऊ । अब निकसन कैसे होऊ ॥
हित गांठ पेंच गहि दीन्हा । दोउ नेह वचन बहु कीन्हा ॥
अरु एक एकनै बांधा । वह समझै नहीं आधा ॥
अब शीश धुनै पछितावै । दोउ चले नरक कूं जावै ॥
कहै चरणदास नहिं जानौ । तुम औगुण ना पहिचानौ ॥
दो० त्वचास्वाद सब वश भये, फँसे जगत के माहिं ।
जो कोई निकमो चहै, सोभी निकसै नाहिं ॥
धोखे की हथिनी लखी, आयोगज ललचाय ।
खंदक माहीं रुकिगयो, शीशधुनै पछिताय ॥
कछू हाथ आयो नहीं, परो फन्द में जाय ।
मैन महावत वश भयो, शिरमें अंकुश खाय ॥
जङ्गल में आनन्दसूं, बहुतै केलि कराय ।
अबतौ द्वारे भूपके, परो बन्ध में आय ॥
२१२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
ऐसेही यह नर फँधो, देखि कामिनी रूप ।
जन्म गँवायो दुखभरो, पड़ो अविद्या कूप ॥
करी न हरिकी भक्तिही, गुरु सेवा तजिदीन ।
सुनी न हरिकी गुणकथा, सतसंगत नहिंकीन ॥
फिर ऐसो कब होयगो, पावै मानुष देह ।
अबतौ चौरासी विषे, जाय कियो उन गेह ॥
जीतौ इन्द्री त्वचाकी, कहिया श्रीशुकदेव ।
यासे तपही कीजिये, चरणदास सुनलेव ॥
शीत उष्णका दुख नहिं मानै । कोमल सकत¹ एककरि जानै ॥
तपसूं काया उमर गवाँवै । अष्टसुगन्ध निकटनहिं जावै ॥
आन त्वचा² रूपरस नहिं करै । कामअग्नि हियमैं ना जरै ॥
काया तावन करनी ठानै । यही तपस्या मन में आनै ॥
त्वचा सु इन्द्री जीतौ ऐसे । मैं यह भेद बतायो जैसे ॥
गुरु शुकदेव बतावै सबही । चरणदास करितन सूं तपही ।
दो० त्वचासुं इन्द्री वश किये, छूटै काम क्लेश ।
यत शत शील सँतोषसूं, लगे न माया लेश ॥
त्वचा अंग पूरो कियो, कहूँ नासिका अंग ।
तावशअलिसुत जीदियो, जाको कहूँ प्रसंग ॥
बास आस गुंजत फिरो, बैठो कमल मँझार ।
सूर³ छिपेसे मुदिगयो, अब शिर दैदै मार ॥
कुंजर⁴ आयो तालपै, जल पीवन के काज ।
प्यासबुझी करने लगो, खेलकरिनको साज ॥
खेलकरत कमलहिगयो, लीन्ह्यो ताहि उपाड़ि ।
फेरिदियो मुख माहिंहीं, चाबिगयो देजाड़ि ॥
१ कड़ा २ देहकी खाल ३ सूर्य ४ हाथी ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । २१३
ऐसेही ये नर फँसे, परे काल मुख जाय ।
चरणदास यों कहत हैं, चांले जन्म गवाँय ॥
सुगंध ओर हरषै नहीं, दुरगन्धै न रिसाय ।
ऐसे जीतै नासिका, मन भवँरा ठहराय ॥
समझनकूँ तुक एक है, भूलनकूँ तुकलाख ।
गुण अवगुण इन्द्री कहैं, सो तू मेन में राख ॥
जो इन्द्रिनके वश भयो, बांधो नरके जाय ।
चौरासी भरमत फिरै, गर्भयोनि दुख पाय ॥
जो इन्द्रिनके वशभयो, पावै ना आनन्द ।
बार बार जगमाहँहीँ, छूटै ना सम्बन्ध ॥
भक्तिमाहिं चित ना लगै, सबही बिगड़ैं काम ।
जो इन्द्रिनके वश भयो, ताको मिलै न राम ॥
चरणदास यों कहत हैं, इन्द्री जीतन ठान ।
जग भूलै हरि कूँ मिलै, पावै पद निरबान¹ ॥
इन्द्री जीतै सो ब्रह्मज्ञानी। इन्द्री जीतै सोई ध्यानी ॥
इन्द्री जीतै सो हरिदासा। अमरलोक में पावै बासा ॥
इन्द्री जीतै सोई सिद्धा। अष्ट कला अरु पावै ऋद्धा ॥
इन्द्री जीतै सोई शूरा। इन्द्री जीतै सो जन पूरा ॥
इन्द्री जीतै सो सतवन्ता। इन्द्री जीतै गुणी महन्ता ॥
इन्द्री जीतै राम रिझावै। इन्द्री जीतै सब कुछ पावै ॥
इन्द्री जीतै सो सन्यासी। इन्द्री जीतै सोइ उदासी ॥
इन्द्र जीतै सब फल दायक। इन्द्री जीतै सब कुछ लायक ॥
इन्द्री जीतै छुटै विदेसा। याजग में कुछलगै न लेशा ॥
इन्द्री जीतै परम सुखारा। निश्चय पहुँचै हरि दरबारा ॥
१ -ब्रह्मपद ॥
२१४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
इन्द्री जीतै सो रणजीता । इन्द्री जीतै आतममीता१ ॥
इन्द्री जीतै ध्यान लगावै । सो निश्चय ईश्वर है जावै ॥
इन्द्री जीतै मिलै भगवन्ता । इन्द्री जीतै जीवनमुक्ता ॥
चरणदास सुनि कहैं शुकदेवा । इन्द्री जीतै सो गुरुदेवा ॥
दो० मन इन्द्रिन के वशभयो, होय रह्यो बेढंग ।
आपा बिसरो जग रलो, हुवो जो नाना रंग ॥
आवै तरंग क्रोधकी, होत जुवाँ२ के रूप ।
काम लहर कबहूं उठै, ताके होत स्वरूप ॥
लोभ कामना जब उठै, जभी लोभ रँग होय ।
मोह कलपना के उठे, मोह वरण हो सोय ॥
मनहीं खेलै खेल सब, मनहीं कर अभिमान ।
मनहीं यह जगद्वै रहो, अबसुनिमनकाज्ञान ॥
कबहूं यह मन होवै गिरही । कबहूं यह मन होवै विरही ॥
कबहूं यह मन होवै रोगी । कबहूं यह मन होवै शोगी ॥
कबहूं यह मन होवै नारी । कबहूं यह मन राखै ख्वारी ॥
कबहूं यह मन दौरा डोलै । कबहूं यह मन टेढ़ा बोलै ॥
कबहूं यह मन कुलका ऊंचा । कबहूं यह मन नकटा बूंचा ॥
कबहूं यह मन दुन्द मचावै । कबहूं क्षमा शील घर आवै ॥
कबहूं यह मन होवै दाता । कबहूं करै सूमसी बाता ॥
चरणदास कहैं मनकूं जानौ । ऐसी विधिमनकूं पहिंचानौ ॥
दो० बहुरूपी बहु रंगिया, बहुतरंग बहु चाव ।
बहुतभांति संसार में, करि करि घने उपाव ॥
यह मन राजा होवै भोगी । यह मन त्यागी होवै योगी ॥
यह मन होवै हरिका भक्ता । यह मन होवै योगरु जुक्ताँ। ॥
१ आत्माका जाननेवाला २ जेवानी. ३ उपाय करनेवाला ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । २१५
यह मन होय विवेकी ज्ञानी । यह मन तपिया जपिया ध्यानी ॥
यह मन करै दयाकी बातें । यह मन करै जीव की घातैं ॥
यह मन यती सती अरु शूरा । यह मन काशी पण्डिंत पूरा ॥
यह मन तीरथ बर्त्त उपासी । यह मन ठकुरानी अरु दासी ॥
यह मन होवै देवी देवा । या मनका कोइ लहै न भेवा ॥
यह मन प्रेमी नेभी जनहीं । चरणदास कहैं सब कुछ मनहीं ॥
दो० या मनके जाने विना, होय न कबहूँ साध ।
जक्त वासना ना छुटै, लहै न भेद अगाध ॥
तैं मनकूं जाना नहीं, करी न याकी सार ।
चौरासी छूटी नहीं, उपजा वारंवार ॥
मनकूं सतसंगति लै जावो । कानो हरियश कथा सुनावो ॥
भांति भांति के रँग ललचाव । तौ हरिके रँग क्यों न रँगावै ॥
तौ याको ज्ञानीही कीजै । जक्त ओर जानै नहिं दीजै ॥
कै दीजै हरिहीका ध्यानू । राम भक्ति में याकूं सानू ॥
कै कीजै यह योगी पूरा । याहि सुनावो अनहद² तूरा ॥
या मनकूं कीजै वै³रागी । याकूं कीजे सर्वस त्यागी ॥
जग रँग उतरि ब्रह्म रँग लागै । जाते कर्म भर्म भय भागै ॥
चरणदास शुकदेव बतावै । मन फेरनि की राह दिखावै ॥
दो० मन् ने आप गवाँइया, ज्ञान' बुझाया दीव ।
करमलगा भरमतफिरो, मिला न अपना पीव ॥
दौरि दौरि रसओरही, होय रहा कंगाल ।
नातरु आगे भूपथा, ऊंचा बड़ा दयाल ॥
पांचौ इन्द्री स्वाद में, भयो निपट आधीन ।
राजबड़ाई सब नशी, भयो मूढ़ मति हीन ॥
१ विचार करनेवाला २ ब्रह्मशब्द का बाजा ३ प्रेमसे अलाहिदा ॥
१६
२१६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सरकिजाय विषओरही, बहुरि न आवै हाथ ।
भजनमाहिं ठहरै नहीं, जो गहि राखूं बाथ ॥
मन निश्चल आवै नहीं, निकसि २ भजिजाय ।
चरणदास यों कहत हैं, काहूकी न बसाय ॥
पविहारे ज्ञानी तपी, रहे बहुत शिर मार ।
मन परेत सूं डर लगै, लै डूबै मँझधार ॥
यह मन भूत समान है, दौड़े दांत पसार ।
बांस गाड़ि उतरै चढ़ै, सब बल जावै हार ॥
यों आतम में मन धरै, होय जहां लौ लीन ।
ठहरि रहै फिरिना चलै, सकल विकल हो क्षीन ॥
भजै तौ जानि नदीजिये, घेरि घेरि करि लाव ।
या मन कूं परचाय करि, ध्यानहिं माहिं लगाव ॥
और कहौं विधि दूसरी, सुनियो चित्त लगाय ।
रामनाम मनसूं जपै, चंचलता थकिजाय ॥
पवन रुकै जब मन थकै, और दृष्टि ठहराय ।
ऐसी साध न साधिये, गुरुगम भेद मिलाय ॥
इन्द्री रोकै मन रुकै, अरु उत्तम विधि एहु ।
चरणदास यों कहत हैं, यह साधन करि लेहु ॥
इन्द्रिन कूं मन वश करै, मनकूं वशकरै पौन ।
अनहद वशकर वायुकूं, अनहदकूं ले तौन ॥
याको नाम समाधि है, मन तामें ठहराय ।
जन्म जन्मकी वासना, ताकूं दग्ध¹ कराय ॥
इन्द्री पलटै मन बिषे, मन पलटै बुधि माहिं ।
बुधि पलटै हरिध्यानमें, फेरि होय लै जाहिं ॥
१ जलाना ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । २१७
दग्ध वासना होय जब, आवागमन नशाय ।
कहें गुरू शुकदेवजी, मुक्तरूप है जाय ॥
मनके सगरे भेदही, जाको दियो जिताव ।
चरणदास अब कहत हैं, झूठ सांच को न्याव ॥
जो कोइ बोलै झूठही, ताकूं लागै पाप ।
जन्म जन्म छूट नहीं, दुखदे तीनौ ताप१ ॥
बोल झूठ महा अपराधी । धरम लुटै उठिलागै बाधी ॥
झूठा सौ सौ सौगँद खाय । झूठा लेवै कर्म लगाय ॥
झूठा करै बिराना बुरा । झूठा रहै जक्त में गिरा ॥
झूठे की परतीति न होई । झूठा बोल न बोलै कोई ॥
झूठा हरिकी भक्ति न पावै । झूठा घोर कुण्ड में जावै ॥
झूठेकूं लागै यम मार । झूठा चौरासी में ख्वार ॥
झूठ वचन का भारी दोष । झूठे की होय गती न मोष ॥
झूठे के नहिं गुरू न राम । झूठेकूं नाहीं विश्राम ॥
चरणदास शुकदेव बताव । झूठे सबी नरककूं जावें ॥
दो० झूठे के मुँह दीजिये, नौसादर का वाप ।
डरा करै सकुचा रहै, वह शरमिंदा आप ॥
झूठेकूं हत्यारा जानौ । झूठेकूं ठग चोर पिछानौ ॥
झूठा कुटिल शराबी होय । झूठा कहिये कामी सोय ॥
झूठेही को जानो ज्वारी । समझि देखि सबही नर नारी ॥
सकल ऐब झूठ में पाऊं । एक एक क्या खोल दिखाऊं ॥
पांचौ खोंट सबन के राजा । सो मैं कहे चितावन काजा ॥
झूठ पाप की कहिये खानि । सो यह करै पुण्यकी हानि ॥
सबही अवगुण झूठे माहीं । चरणदास शुकदेव बताहीं ॥
१ दैहिक दैविक भौतिक ॥
२१८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० सांच बिना साधू नहीं, कबहुं न मिलिहैं राम ।
सांच बिना गतिनालहै, पावै ना निजधाम ॥
सत सतमुखसूं बोलिये, सतही चलिये चाल ।
सतही मनमें राखिये, सतही रहिये नाल ॥
सांचे कूं ग्रह ना लगै, सांचे कूं नहिं दाग ।
सांचे शाप न लागई, सब दुख जावै भाग ॥
बड़ी तपस्या सांच है, बड़ा बरत है सांच ।
जासों पाप सभी जरैं, लगै न गर्मको आंच ॥
जाका वचन मुड़ै नहीं, सांचे सब व्यवहार ।
चरणदास त्रयलोक में, कभी न आवै हार ॥
सांचे के मनहीं में राम । सांचा करै न छल के काम ॥
सांचा होकर सुमिरण करै । आप तरै औरन लै तरै ॥
सतवादी की पति है सांच । ताकूं लगै न दिव की आंच ॥
सांचे चोर चुराया घोड़ा । परमेश्वर ताका रँग मोड़ा ॥
और चोर चोरीसूं गया । सांच प्रताप अचम्भा भया ॥
औरे सांच प्रताप अनन्ता । सबही जानै साधू सन्ता ॥
लाख बातका एकहि जोड़ । सांचा पुरुष सबन शिरमोड़ ।
आवै सांच परम सुख पावै । चरणदास शुकदेव सुनावै ॥
दो० सांचे की पदवी बड़ी, दुष्ट साध के माहिं ।
दोनों अस्तुतिही करें, निन्दक कोई नाहि ॥
गुरू कहै सो कीजिये, करै सो कीजै नाहिं ।
चरणदास की सीखसुन, यही राखि मनमाहिं ॥
कथा सुनी ब्रतहू किये, तीरथ किये अघाय ।
गुरुमुख के होये विना, जप तप निर्फल जाय ॥
अब गुरुमुख के लक्षण गाऊं, जुदे जुदे करि सब समझाऊं ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । २१६
इन कूं समझ धरै हिय कोई । पूरा गुरुमुख कहिये सोई ॥
प्रथमहिं गुरुसों झूठ न बोलै । खोटी खरी करै सब खोलै ॥
दूजे गुरुको पयं¹ न लगावै । निश्चय गुरुके चरण मनावै ॥
तीजे आज्ञाकारी जानौ । इन लक्षण गुरुमुखी पिछानौ ॥
जो कोई गुरुका लेवै नाम । ताको निहुरि करै परणाम ॥
जो कहुं देखै गुरुका बाना । जाकूं जानै गुरू समाना ॥
चरणदास शुकदेव बखानै । गुरुभाई कूं गुरुसम जानै ॥
दो० गुरुभाई कूं पूजिये, धरिये चरणन शीश ।
चरणोदक² फिरिलीजिये, गुरुमत बिश्वाबीश ॥
जो कहुं गुरुका बस्तर पावै । हिये लगाय चूम दृगल्यावै ॥
गुरू देश का मानुष आवै । दै परिक्रमा बलि बलि जावै ॥
कहै दया करि दर्शन दीन्हें । मेरे पाप भये सब क्षीन्हे ॥
जो अपने गुरुद्वारे जइये । देखत पौरि बहुत हरषइये ॥
हांईं सूँ दण्डवत जु कीजै । दर्शन करिकरि सर्वस दीजै ॥
फिर ठाढ़ो रहै जोरे हाथा । बैठे तब आज्ञा दे नाथा ॥
जो बोलैं सो मन में धरिये । अपने अवगुण सबही हरिये ॥
चरणदास शुकदेव बतावै । ऐसा गुरुमुख राम रिझावै ॥
दो० साधुन की निंदा बुरी, मत कोइ कीजो भूल ।
दुनिया में दुख पायहैं, रहैं नरक में झूल ॥
साधुका निन्दक तन मन दुखी । साधुका निन्दक होय न सुखी ॥
निन्दक साधु दरिद्री होय । निंदक डारै सर्वस खोय ॥
साधुका निंदक नरक मँझार । निश्चय खावै यमकी मार ॥
साधुका निंदक पूरा पापी । साधुका निंदक डूबै आपी ॥
मूरख होय सो निन्दा करै । साधु संत कूं अवगुण धर ॥
१ किसी प्रकार का झूठा दोष २ चरणों का धोयाहुआ जल ॥
२२० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
साधुका निन्दक श्वान समान। साधुका निन्दक शूकर जान ॥
साधु रामकी कहिये देह। निन्दक के मुख माहीं खेह॥
चरणदास निन्दा तजि दीजै। भक्तोंकी अस्तुतिही कीजै ॥
दो० साधोंकी अस्तुति किये, हरिकी अस्तुति होय ।
भक्तों की निन्दा किये, प्रभुकी निन्दा सोय ॥
श्रीनिकुंजविहारिणे नमः ॥
अथ श्रीशुकदेव मुनिराज महाप्रभु के शिष्य श्रीश्यामचरणदास
जी महाराज रचित वेदस्तुति लिख्यते ॥
दो० भक्ति पदारथ कारने, देहुं वेद की साख ।
ताको भेद मिलाइये, चरणदास कहैं भाख ॥
गुरु शुकदेव प्रताप सों, कहूं वेद को वाक ।
संस्कृत भाषा करी, आदि सनातन साख ॥
नारद सू नारायनहि, देव लोक सनकाद ।
शुकदेव परिक्षित सों कही, मैं कहूं सुनियो साध ॥
अष्टपदीछन्द ॥
श्री शुकदेव गुरु के बचन विचार के ।
वेद स्तुति की कथा कहूं उरधार के ॥
भक्ति प्रापत होय जक्त ब्याधा नसे ।
अंत मुक्ति पद पाय अमरपुर जा बसे ॥
श्री भागवत पुराण दस्म असकंध में ।
कही कथा सुखदान हिये के हुलास तें ॥
राजा परिक्षित कहत श्रीशुकदेव कों ।
मोहिं कहो समझाय सकल याभेव कों ॥
हरि स्तुति भलिभांति सूं वेदन गाइहैं।
निर्मल परम पुनीत सो मोमन भाइहैं ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । २२१
निरगुन स्तुति अधिक जू सरगुन में कही ।
मेरे मन में समझि न आवत कछु यही ॥
बोले गुरु शुकदेव ये सुन के बात कूं ।
राजा मनचितलाय सुनों या काथ कूं ॥
हरि इच्छा सों जबहि उन्ह शिक्षा भई ।
तब अधिकारी होय स्तुति वेदन कही ॥
दो० नारायण पै जाय के, नारद चरणहि दास ।
यही बात पूछत भए, कर कर उमंग हुलास ॥
अष्टपदीछन्द ॥
हरि भक्तन के मांहि महा मुनि अति गुनी ।
एक दिवस कर चाव श्री नारद मुनी ॥
श्री नारायण पास जु वह चल कर गयो ।
दरशन उनके पाय मुदित मन में भयो ॥
नमस्कार कर जोर ऋषी ज्ञानी महा ।
नारायन सों बोल बचन ऐसे कहा ॥
स्तुति श्रीभगवान की वेदन गाई है ।
सो सब हम को आज कही समझाईए ॥
श्रीनारायण बोल वचन मुखते कहै ।
नारदसों यहि भांति वचन भाखत भये ॥
एक दिवस सनकादि ऋषी शिरमौरही ।
सुत ब्रह्मा के जान न उन सम औरही ॥
बैठ सभा के मांहि देवही लोक में ।
राजत जैसे चंद तारन संयोग में ॥
तहां चली यह बात सकल मन भांवती ।
वेदन स्तुति कही किहिं भांति सुहावती ॥
२२२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चारों भैया जान सनक कूं आदि दे ।
परम पुनीत प्रवीन सकल गुन आगरे ॥
भगवत कथा सब कोऊ सुने चित लायके ।
जो पे ज्ञानी होंहिं ज्ञान को पाय के ॥
तिहि कारनही बैठ सकल आता तहां ।
बोले अति परबीन सनक इहि बिधि जहां ॥
वेदन ऐसीं भांत सूं यह स्तुति करी ।
जै जै जै तुम आदि पुरुष नित हो हरी ॥
त्यागो निद्रा जोग जागो करतार जू ।
निज माया बिस्तार सृजो संसार हू ॥
जो पै माया रहत तुम्हारे संगही ।
तुम कबहु करतार जु वाके बस नहीं ॥
खोटी अधम जो नारि कहीं कोई होत है ।
अपने पति को दोष लगावत है वहै ॥
यह कारन मन लाय के माया परिहरो ।
जग सिरजन के काज आप आज्ञा करो ॥
तुम तिरबिधि भगवान रहत ब्रह्माण्ड में ।
प्रथम सूक्ष्म प्रान रहत है पिण्ड में ॥
दुतिय रूप
भक्तिपदार्थवर्णन । २२३
घटो बढ़ो तुम नाहिं सदा पूरन रहो ॥
आदि अंत सब सृष्टि के पुरुष अनन्त जू ।
नितही इकरस रहत तुमही भगवंत जू ॥
जो तुम ऐसी भांति कहो हरि देव जू ।
हमसो उत्पति भई तुम्हारी भेव जू ॥
तुमतो कैसी भांति हमें पहचानई ।
स्तुति ऐसी भांति कैसे के बखानई ॥
दो० ऐसी बुद्धि हमरी भई, तुम्हरे ही परताप ।
हम तो चरणहिं दास हैं, तुमही करता आप ॥
अष्टपदीछन्द ॥
यह सब किरपा नाथ तुम्हारी जानियै ।
ना तो केतिक बुद्धि हमारी मानियै ॥
तुमही सगरी सृष्टि के कारन रूप हो ।
तुम उपजावन पालन मारन रूप हो ॥
ज्यों घट नाना भाँति यों ही संसार है ।
फूटे मांटी होय सभी यों विचार है ॥
ऐसेही इक ब्रह्म सकल व्यापक सदा ।
नाम अनेक कहाय हम बरने कहा ॥
निराकार निरलिप निरगुन करतार हो ।
अपने भक्तन हेत लेत अवतार हो ॥
तुमरी लीला नाथ जो परम सुहाई ।
जो जन कहै और सुनै हिये में लावई ॥
ते जन लहत पुनीत जो पद निरबान कूं ।
अंतकाल तुम्हें मिलत जो ऐसे ज्ञान सूं ॥
तुमरी भक्ति अनन्य जो कोई जन करै ।
ज्ञानस्वरोदय, मनविरक्तकरण एवं धर्मजहाज ग्रन्थ
२२४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जन्म सुफल तिहि होय मुक्ति पर पग धरै ॥
प्रेम मगन ज्यों साधु तेरो गुन गावईं ।
होय सु महाप्रसाद प्रीति सों पावईं ॥
जोगेश्वर चित लाय जू तुमकूं ध्यावईं ।
प्रान वायु कूं खैंच त्रिकुटी लावईं ॥
हृदय कमल के मांह तुमहि कूं देखई ।
अद्भुत रूप सरूप अनूपम पेखई ॥
अगम पंथ भगवान तुम्हारो जानिये ।
कहन शक्त परमान कोउ हिय आनिये ॥
अगम पंथ इह भांति तुम्हारो नाथ जू ।
पहुँच सके किहिं भांति सुनो यह बात जू ॥
भक्ति तुम्हारी नाथ स्मृति वरनन करैं ।
पावैं इस विधि तोंहि प्रीति तुमसों करैं ॥
तुम्हरी भक्ति अनूप हिये में धारई ।
चार पदारथ संत कबहु चाहत नहीं ॥
ऐसे लक्षन होहिं तुम्हारे भक्त के ।
अंतर प्रेम अगाध बाहर जड़ रूप से ॥
मन के मांहीं ध्यान तुम्हारो ही बसे ।
कबहुँ रोव आप कबहु आपहि हंसे ॥
हंसत तुम्हारे ध्यान बहु हरखाय के ।
देख दशा संसार रोवे पछताय, के ॥
कबहु मगन मन होय ध्यान दृढ़ कर गहै ।
साजे तुम्हरी भक्ति जहां चित्त दे रहै ॥
बिना भक्ति कुछ और न जिय में जानई ।
बिरले ऐसे कोय जक्त में मानई ॥