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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 246, कुल 690 में से

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पृष्ठ 246

⁕ भक्तिपदार्थवर्णन । २०६
अहंकार बढ़ा मन माहीं। आधीन विना गति नाहीं ॥
सुनि उपजै तामस अंगा। जब करै बहुतही दंगा१ ॥
मन क्रोधरूप हो जावै। उठ उठकर मारन धावै ॥
कभी सुनै मोह के बैना। लगै हर्ष शोक दुख दैना ॥
जब सुनै कुटुंब की नीकी। तब करे खुशी बहु जीकी ॥
कोइ कुटुंब माहिं दुख पावै। सुन रोरो नैन गवाँवै ॥
जो हिरन कानवश हुवा। तौ तीर लाग करि मूवा ॥
शुकदेव कहैं यह जानौ। सब कान विकार पिछानौ ॥
दो० मन दै सुनिये हरि कथा, सुनिये हरियश कान ।
ताहि विचारिजु कीजिये, होय भक्ति का ज्ञान ॥
उपजै ज्ञान भक्ति अरु योगा। सुन सुन उपजैराम वियोगा ॥
उपजै प्रेम अनन्य उमाहा। होय उछाह दरशका चाहा ॥
सुन सुन उपजै लक्षण साधू। सुन २ पावै भेद अगाधू ॥
उपजै साधु संतकी सेवा। गुरुमुख होय सुनै यहि मेवा ॥
सुनि २ उपजै भय अरु लाजा। सोवै सकल सँवारन काजा ॥
सुनि सुनि यती सती हो जावै। न्हाहो अभिमान नशावै ॥
सुनि सुनि छूटै यमकी त्रासा। चौरासी में सहै न बासा ॥
सुनि सुनि चार पदारथ पावै। आवागवन के बीज जरावै ॥
सुनि सुनि काग हंस होजाई। चरणदास शुकदेव बताई ॥
दो० सुनि २ उपजै सुबुधिही, लागै हरिका रंग ।
सुनिसुनिउपजैकुबुद्धिही, खोटी उठै तरंग॥
ऐसी इन्द्री कानकी, जाके युगल सुभाव ।
कथा कीरतनहीं सुनौ, करि २ कोटि उपाय ॥
१ फिसाद ॥