भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
वचन सुनो गुरु साधुके, मनकूं लावो मोर ।
विषय वासनासूं निकस, आवै हरिकी ओर ॥
सरवन इन्द्री में कही, दोनों अंग दिखाय ।
जिह्वा इन्द्री कहत हैं, चरणदास चितलाय ॥
कुटिल जु इन्द्री जीभकी, चाहे षटरस स्वाद ।
यावश हो अवगुण करै, जन्म जाय बरबाद ॥
यह बहुत चटोरी कहिये । याही ते डरते रहिये ॥
यह चोरी भी करवावै । यह पकड़ बन्ध में पावै ॥
करै याही कारण जारी । यह करे बहुतही ख्वारी ॥
यह अपलें खान सिखलावै । अरु गाली मार दिलावै ॥
अरु बहुते झूठ बुलावै । हो मीत नरक लेजावै ॥
खेलै याही कारण जुवा । दुनियां में फिट फिट हूवा ॥
ये पांचौ ऐब सुनाऊं । रसना में सभी दिखाऊं ॥
यह महा अपरबल जानौ । अरु रणजीता हो मानौ ॥
दो० जिह्वा के जीते विना, गये जन्म सब हार ।
चरणदास यों कहत हैं, भये जगत में खार ॥
बंशी डारी ताल में, मछरी लागी आय ।
जिह्वाकारणजियदियो, तलफितलफि मरि जाय ॥
तजा न जिह्वा स्वादकूं, वा संग दीन्हे प्रान ।
जो कोइ ऐसा जगत में, सो अज्ञानी जान ॥
यासूं ले हरनामहीं, गुणावादही भाख ।
जो बोलै तौ सांचहीं, नाहीं मुखमें राख ॥
मीठा वचन उचारियो, नवता सबसूं बोल ।
हिरदैमाहिं विचारिकरि, जबमुख बाहरखोल ॥
१ नम्रता ॥