भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिपदार्थवर्णन । २१३
ऐसेही ये नर फँसे, परे काल मुख जाय ।
चरणदास यों कहत हैं, चांले जन्म गवाँय ॥
सुगंध ओर हरषै नहीं, दुरगन्धै न रिसाय ।
ऐसे जीतै नासिका, मन भवँरा ठहराय ॥
समझनकूँ तुक एक है, भूलनकूँ तुकलाख ।
गुण अवगुण इन्द्री कहैं, सो तू मेन में राख ॥
जो इन्द्रिनके वश भयो, बांधो नरके जाय ।
चौरासी भरमत फिरै, गर्भयोनि दुख पाय ॥
जो इन्द्रिनके वशभयो, पावै ना आनन्द ।
बार बार जगमाहँहीँ, छूटै ना सम्बन्ध ॥
भक्तिमाहिं चित ना लगै, सबही बिगड़ैं काम ।
जो इन्द्रिनके वश भयो, ताको मिलै न राम ॥
चरणदास यों कहत हैं, इन्द्री जीतन ठान ।
जग भूलै हरि कूँ मिलै, पावै पद निरबान¹ ॥
इन्द्री जीतै सो ब्रह्मज्ञानी। इन्द्री जीतै सोई ध्यानी ॥
इन्द्री जीतै सो हरिदासा। अमरलोक में पावै बासा ॥
इन्द्री जीतै सोई सिद्धा। अष्ट कला अरु पावै ऋद्धा ॥
इन्द्री जीतै सोई शूरा। इन्द्री जीतै सो जन पूरा ॥
इन्द्री जीतै सो सतवन्ता। इन्द्री जीतै गुणी महन्ता ॥
इन्द्री जीतै राम रिझावै। इन्द्री जीतै सब कुछ पावै ॥
इन्द्री जीतै सो सन्यासी। इन्द्री जीतै सोइ उदासी ॥
इन्द्र जीतै सब फल दायक। इन्द्री जीतै सब कुछ लायक ॥
इन्द्री जीतै छुटै विदेसा। याजग में कुछलगै न लेशा ॥
इन्द्री जीतै परम सुखारा। निश्चय पहुँचै हरि दरबारा ॥
१ -ब्रह्मपद ॥