भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 244, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंभक्तिपदार्थवर्णन । २०७
चंलौ करै थिर ना रहै, कोटि यतनकरि राख ।
यह जबही वश होयगा, इन्द्रिन के रस नाख ॥
न्यारे न्यारे चहतहैं, अपने अपने स्वाद ।
इन पांचौमें प्रीति है, कछू न वाद विवाद ॥
दुर्जन के फूटे बिना, तेरी होय न जीत ।
चरणहिंदास विचारिकरि, ऐसी कहिये रीत ॥
जुदी जुदी पांचौ कहौं, एक एक का भेद ।
जो कोइ इनकूं वशकरै, सबही छूटै खेद ॥
यह इन्द्री आंख विचारो । सो देत महा दुख भारो ॥
वह रागद्वेष उपजावै । अरु हरष शोक लै आवै ॥
सो रूप माहिं फँस जावै । तन मन में व्याधि उठावै ॥
वह देह औरके हाथा । करि डारै बहुत अनाथा ॥
वह फंदे माहीं डारै । अरु काम अगिनि में जारै ॥
यह डोलै दौरी दौरी । करचित बुधिकी गति औरी ॥
कोइ साधु शूरमा मोड़ै । जग सेती नैना तोड़ै ॥
कहैं चरणदास सुनि लीजै । कछु याका यतन करीजै ॥
दो० दीपक त्रिया निहारि करि, गिरै पतंग¹ ज्यों जाय ।
कछू हाथ आवै नहीं, उलटी आप जराय ॥
उन तन मन सभी जराया । कछु भोंदू हाथ न आया ॥
अरु विषय वासना फैला । जब छुटा रामका गैला² ॥
तौ मुक्ति कहां सों होई । दिया जन्म अकारथ खोई ॥
अब क्या शिरमारै कोई । घरहीं में दुर्जन सोई ॥
यह दृष्टि सदा की वैरी । जो सुरत बिगारै तेरी ॥
वह माया मोह लगावै । अरु चौरासी भरमावै ॥
१ पांखी २ रास्ता ॥