भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
ऐसेही यह नर फँधो, देखि कामिनी रूप ।
जन्म गँवायो दुखभरो, पड़ो अविद्या कूप ॥
करी न हरिकी भक्तिही, गुरु सेवा तजिदीन ।
सुनी न हरिकी गुणकथा, सतसंगत नहिंकीन ॥
फिर ऐसो कब होयगो, पावै मानुष देह ।
अबतौ चौरासी विषे, जाय कियो उन गेह ॥
जीतौ इन्द्री त्वचाकी, कहिया श्रीशुकदेव ।
यासे तपही कीजिये, चरणदास सुनलेव ॥
शीत उष्णका दुख नहिं मानै । कोमल सकत¹ एककरि जानै ॥
तपसूं काया उमर गवाँवै । अष्टसुगन्ध निकटनहिं जावै ॥
आन त्वचा² रूपरस नहिं करै । कामअग्नि हियमैं ना जरै ॥
काया तावन करनी ठानै । यही तपस्या मन में आनै ॥
त्वचा सु इन्द्री जीतौ ऐसे । मैं यह भेद बतायो जैसे ॥
गुरु शुकदेव बतावै सबही । चरणदास करितन सूं तपही ।
दो० त्वचासुं इन्द्री वश किये, छूटै काम क्लेश ।
यत शत शील सँतोषसूं, लगे न माया लेश ॥
त्वचा अंग पूरो कियो, कहूँ नासिका अंग ।
तावशअलिसुत जीदियो, जाको कहूँ प्रसंग ॥
बास आस गुंजत फिरो, बैठो कमल मँझार ।
सूर³ छिपेसे मुदिगयो, अब शिर दैदै मार ॥
कुंजर⁴ आयो तालपै, जल पीवन के काज ।
प्यासबुझी करने लगो, खेलकरिनको साज ॥
खेलकरत कमलहिगयो, लीन्ह्यो ताहि उपाड़ि ।
फेरिदियो मुख माहिंहीं, चाबिगयो देजाड़ि ॥
१ कड़ा २ देहकी खाल ३ सूर्य ४ हाथी ॥