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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 252, कुल 690 में से

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पृष्ठ 252

भक्तिपदार्थवर्णन । २१५
यह मन होय विवेकी ज्ञानी । यह मन तपिया जपिया ध्यानी ॥
यह मन करै दयाकी बातें । यह मन करै जीव की घातैं ॥
यह मन यती सती अरु शूरा । यह मन काशी पण्डिंत पूरा ॥
यह मन तीरथ बर्त्त उपासी । यह मन ठकुरानी अरु दासी ॥
यह मन होवै देवी देवा । या मनका कोइ लहै न भेवा ॥
यह मन प्रेमी नेभी जनहीं । चरणदास कहैं सब कुछ मनहीं ॥
दो० या मनके जाने विना, होय न कबहूँ साध ।
जक्त वासना ना छुटै, लहै न भेद अगाध ॥
तैं मनकूं जाना नहीं, करी न याकी सार ।
चौरासी छूटी नहीं, उपजा वारंवार ॥
मनकूं सतसंगति लै जावो । कानो हरियश कथा सुनावो ॥
भांति भांति के रँग ललचाव । तौ हरिके रँग क्यों न रँगावै ॥
तौ याको ज्ञानीही कीजै । जक्त ओर जानै नहिं दीजै ॥
कै दीजै हरिहीका ध्यानू । राम भक्ति में याकूं सानू ॥
कै कीजै यह योगी पूरा । याहि सुनावो अनहद² तूरा ॥
या मनकूं कीजै वै³रागी । याकूं कीजे सर्वस त्यागी ॥
जग रँग उतरि ब्रह्म रँग लागै । जाते कर्म भर्म भय भागै ॥
चरणदास शुकदेव बतावै । मन फेरनि की राह दिखावै ॥
दो० मन् ने आप गवाँइया, ज्ञान' बुझाया दीव ।
करमलगा भरमतफिरो, मिला न अपना पीव ॥
दौरि दौरि रसओरही, होय रहा कंगाल ।
नातरु आगे भूपथा, ऊंचा बड़ा दयाल ॥
पांचौ इन्द्री स्वाद में, भयो निपट आधीन ।
राजबड़ाई सब नशी, भयो मूढ़ मति हीन ॥
१ विचार करनेवाला २ ब्रह्मशब्द का बाजा ३ प्रेमसे अलाहिदा ॥
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