भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 242, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंभक्तिपदार्थवर्णन । २०५
यह माया सबकूं मोहै। वस होय न ऐसा कोहै ॥
यह बहुत सोहनी लागै। सबही नरनारी पागै ॥
कहिं चमक दमक बहुरूपा। अरु कहीं रंक कहिं भूपा ॥
अरु जहँ तहँ अधिक तमासे। वह भांति भांतिही भासे ॥
अरु जहँ लग सकल सवादा। कोइ करै जु वाद विवादा ॥
अरु काम क्रोध मोह लोभा। अरु मान बड़ाई शोभा ॥
अरु पांचौ इन्द्री जानौ। सब माया रूप पिछानौ ॥
अरु पांच¹ तत्त्व गुण तीनौ²। सो माया ही कूं चीन्हौ ॥
वह मकर पेच छले जानै। अरु पहर पहर बहुबानै ॥
गुरु शुकदेव जनावै। सब माया खेल दिखावै ॥
दो० जेते सुख संसार के, सबही माया जार।
तामें दो कणका धरे, एक द्रव्य एक नार ॥
लालच लागै चावसूं, गिरे आय करि लोय।
फँसे आपसूं आपही, गहि नहिं लाया कोय ॥
पांचौ इन्द्री सों लखै, सो माया आकार।
याहीसेती सब भयो, जहाँ लगहै साकार ॥
अरु माया रूप अनन्ता। कोइ जानै साधू सन्ता ॥
कहा सुना अरु देखा। सब माया रूप विशेखा ॥
आठ सिद्ध नौ माया। जहाँ जोगी तपी भुलाया ॥
अरु माया फंदे मांहीं। सब जीव आइ फँसि जाहीं ॥
वै नरक माहिं दुख पावैं। यम छप्पन त्रास दिखावैं ॥
फिर भुगतै लख चौरासी। वे गरभ योनि के वासी ॥
वे पशू देह धरि धावैं। नहिं मुक्त ठिकाना पावैं ॥
चरणदास कहैं नर चेतौ। तजौ मायाही सूं हेतौ ॥
१ पृथ्वी अप् तेज वायु आकाश २ सात्त्विक राजस तामस ॥