भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० जगत बासना के तजे, माया की न बसाय ।
कर्म्म छुटै मिटै जीवता, मुक्तरूप हो जाय ॥
फँसे न इन्द्री स्वाद में, चरणकमल में ध्यान ।
पर आशा कोइ नारहै, लगै न माया बान ॥
सबमें अधिकी ज्ञान है, तासे ऊंचो ध्यान ।
ध्यान मिलावै पीवकूँ, पावै पद निरवान ॥
ध्याता ध्येय कैसे मिलैं, होय न विचमें ध्यान ।
तीनौ एक हुये बिना, लहै न पद निरवान ॥
इन्द्रिन के वश मन रहै, मनके वश रहै बुद्ध ।
कहौ ध्यान कैसे लगे, ऐसा जहां विरुद्ध ॥
जित जित इन्द्री जातहैं, तित मनकूँ लेजात ।
बुधिभी संगहि जात है, यह निश्चयकरि बात ॥
जित इन्द्री मनहूं गया, रही कहाँसूं बुद्धि ।
चरणदास यों कहत हैं, करि देखो तुम शुद्धि ॥
इन्द्री मनके वश करै, मन कर बुधिके संग ।
बुधि राखै हरि पद जहाँ, लागै ध्यान अभंग² ॥
इन्द्री मन मिल होत है, विषय वासना चाह ।
उपजै जैसे कामही, नारी मिल अरु नाहँ³ ॥
न्यारे न्यारे तत रहें, होत न कछू उपाध ।
जुदे राखमन इन्द्रियन, गुरुगम साधन साध ॥
इन्द्रीसूं मन जुदाकरि, सुरत निरतकरि शोध ।
उपजै ना विप वासना, चरणदास को बोध ॥
इन्द्री रोकेते रुकै, और जतन नहिं कोय ।
मन चंचल रिझवार है, रसिक सवादी सोय ॥
१ बैर २ जो भंग न हो ३ पति ॥