भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
सरकिजाय विषओरही, बहुरि न आवै हाथ ।
भजनमाहिं ठहरै नहीं, जो गहि राखूं बाथ ॥
मन निश्चल आवै नहीं, निकसि २ भजिजाय ।
चरणदास यों कहत हैं, काहूकी न बसाय ॥
पविहारे ज्ञानी तपी, रहे बहुत शिर मार ।
मन परेत सूं डर लगै, लै डूबै मँझधार ॥
यह मन भूत समान है, दौड़े दांत पसार ।
बांस गाड़ि उतरै चढ़ै, सब बल जावै हार ॥
यों आतम में मन धरै, होय जहां लौ लीन ।
ठहरि रहै फिरिना चलै, सकल विकल हो क्षीन ॥
भजै तौ जानि नदीजिये, घेरि घेरि करि लाव ।
या मन कूं परचाय करि, ध्यानहिं माहिं लगाव ॥
और कहौं विधि दूसरी, सुनियो चित्त लगाय ।
रामनाम मनसूं जपै, चंचलता थकिजाय ॥
पवन रुकै जब मन थकै, और दृष्टि ठहराय ।
ऐसी साध न साधिये, गुरुगम भेद मिलाय ॥
इन्द्री रोकै मन रुकै, अरु उत्तम विधि एहु ।
चरणदास यों कहत हैं, यह साधन करि लेहु ॥
इन्द्रिन कूं मन वश करै, मनकूं वशकरै पौन ।
अनहद वशकर वायुकूं, अनहदकूं ले तौन ॥
याको नाम समाधि है, मन तामें ठहराय ।
जन्म जन्मकी वासना, ताकूं दग्ध¹ कराय ॥
इन्द्री पलटै मन बिषे, मन पलटै बुधि माहिं ।
बुधि पलटै हरिध्यानमें, फेरि होय लै जाहिं ॥
१ जलाना ॥