भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिपदार्थवर्णन । २११
बिना स्वादही खाइये, राम भजन के हेत ।
चरणदास कहै शूरमा, ऐसे जीतौ खेत ॥
जिन जीतौहै जीभकूं, जिन जीती सब देह ।
कहै गुरू शुकदेवजी, मुक्तिधाम फल लेह ॥
रसना जीतै भक्ति जो, सो योगी सो साध ।
अगम पन्थ मांह पगधरे, पहुँचै देश अगाध ॥
त्वचा सुइन्द्री काम की, नितही खेलें दाव ।
पशुपक्षी असुरा नरा, फँसे आपकरि चाव ॥
यह त्वचा सु मल मल मांजै । अरु काजल सुरमा आंजै ॥
यह तेल फुलेल लगावै । अरु चिकना गात बनावै ॥
अरु बस्तर भूषण पहिरै । करै अंजन मंजन गहिरै ॥
अरु लपटस की विधि ठानै । सव याही कूं सुखमानै ॥
अरु फँसे आय करि दोऊ । अब निकसन कैसे होऊ ॥
हित गांठ पेंच गहि दीन्हा । दोउ नेह वचन बहु कीन्हा ॥
अरु एक एकनै बांधा । वह समझै नहीं आधा ॥
अब शीश धुनै पछितावै । दोउ चले नरक कूं जावै ॥
कहै चरणदास नहिं जानौ । तुम औगुण ना पहिचानौ ॥
दो० त्वचास्वाद सब वश भये, फँसे जगत के माहिं ।
जो कोई निकमो चहै, सोभी निकसै नाहिं ॥
धोखे की हथिनी लखी, आयोगज ललचाय ।
खंदक माहीं रुकिगयो, शीशधुनै पछिताय ॥
कछू हाथ आयो नहीं, परो फन्द में जाय ।
मैन महावत वश भयो, शिरमें अंकुश खाय ॥
जङ्गल में आनन्दसूं, बहुतै केलि कराय ।
अबतौ द्वारे भूपके, परो बन्ध में आय ॥