भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
इन्द्री जीतै सो रणजीता । इन्द्री जीतै आतममीता१ ॥
इन्द्री जीतै ध्यान लगावै । सो निश्चय ईश्वर है जावै ॥
इन्द्री जीतै मिलै भगवन्ता । इन्द्री जीतै जीवनमुक्ता ॥
चरणदास सुनि कहैं शुकदेवा । इन्द्री जीतै सो गुरुदेवा ॥
दो० मन इन्द्रिन के वशभयो, होय रह्यो बेढंग ।
आपा बिसरो जग रलो, हुवो जो नाना रंग ॥
आवै तरंग क्रोधकी, होत जुवाँ२ के रूप ।
काम लहर कबहूं उठै, ताके होत स्वरूप ॥
लोभ कामना जब उठै, जभी लोभ रँग होय ।
मोह कलपना के उठे, मोह वरण हो सोय ॥
मनहीं खेलै खेल सब, मनहीं कर अभिमान ।
मनहीं यह जगद्वै रहो, अबसुनिमनकाज्ञान ॥
कबहूं यह मन होवै गिरही । कबहूं यह मन होवै विरही ॥
कबहूं यह मन होवै रोगी । कबहूं यह मन होवै शोगी ॥
कबहूं यह मन होवै नारी । कबहूं यह मन राखै ख्वारी ॥
कबहूं यह मन दौरा डोलै । कबहूं यह मन टेढ़ा बोलै ॥
कबहूं यह मन कुलका ऊंचा । कबहूं यह मन नकटा बूंचा ॥
कबहूं यह मन दुन्द मचावै । कबहूं क्षमा शील घर आवै ॥
कबहूं यह मन होवै दाता । कबहूं करै सूमसी बाता ॥
चरणदास कहैं मनकूं जानौ । ऐसी विधिमनकूं पहिंचानौ ॥
दो० बहुरूपी बहु रंगिया, बहुतरंग बहु चाव ।
बहुतभांति संसार में, करि करि घने उपाव ॥
यह मन राजा होवै भोगी । यह मन त्यागी होवै योगी ॥
यह मन होवै हरिका भक्ता । यह मन होवै योगरु जुक्ताँ। ॥
१ आत्माका जाननेवाला २ जेवानी. ३ उपाय करनेवाला ॥