भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 245, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें२०८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
शर्म सकुच सब खोवै । अरु बीज कुबुधि का बोवै ॥
यह ठग चोरी की बानी । अरु जार¹ करम अगवानी ॥
यह पानप सभी घटावै । यमपुर के त्रास दिखावै ॥
कहैं गुरू शुकदेवा । ये आंख महादुख देवा ॥
दो० ऐसी इन्द्री आंख की, सो अपनी नहिं होय ।
गुरु शुकदेव बतावई, चरणदास सुन लोय ॥
दर्शन कीजै साधु का, कै गुरु का कर लोय ।
जहाँ तहाँ ब्रह्म देखिये, दुबिधा दुर्मति खोय ॥
बैरी भिंतर एकै सा, एके रूप कुरूप ।
एसी होवै दृष्टिही, जब समझै मन भूप ॥
सुन दूजै इन्द्री काना। सो गुरु परतापै जाना ॥
जब सुनै काम रस रीता । तब भूलै पढ़ सुन गीता ॥
मन उपजै काम तरंगा । जब होत ध्यान में भंगा ॥
फिर लोभ बचन सुन औरै । जब तृष्णा चहुँदिशि दौरै ॥
कहिं द्रव्य हाथ लगि जावै । यों शोचि शोचि दुख पावै ॥
कहै ठग चोरी कर लाऊं । कहिं गड़ा दबाहो पाऊं ॥
काहू सुनै जु दौलत बंधा । मनही मन रोवै अंधा ॥
यों उपजै अधिकी लोभा । जब बढ़ै पापको गोभा ॥
कहैं चरणहिंदास विचारी । सुन चेतौ नर अरु नारी ॥
फिर सुनै बड़ाई कुल की । जब पुलक हंसत है मुलकी ॥
जो अपनी सुनै बड़ाई । जब अहूँ होत अकड़ाई ॥
फिर करन बड़ाई लागै । सोतां ज्यों कूकुर जागै ॥
जब उपजै बहु अभिमाना । अरु नेक न होवै नान्हा ॥
पर निन्दा बहुत सुहावै। नहिं और बड़ाई भावै ॥
१ छिनारा ॥