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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 238, कुल 690 में से

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पृष्ठ 238

सबही दया के अंग हैं, इन ते पावै मोष ॥
दया ज्ञान का मूल है, दया भक्ति का जीव ।
चरणदास यों कहत हैं, दया मिलावै पीव ॥
दया नहीं तौ कुछ नहीं, सबही थोथी बात ।
बाहर कथनी सोहनी, भीतर लागी घात ॥
छापे तिलक बनायकै, माला पहिरी दोय ।
दया बिना बक¹सम अहो, साधुरूप नहिं होय ॥
दया न आई घट बिषे, हीया बड़ा कठोर ।
यह नगरी कैसे बसै, तामें हिंसा² चोर ॥
पँडिताई बहुतै करी, दया न राखी जीव ।
छाँछि³ छाँछि तैं लैलई, डारि दिया तत घीव ॥
तोहिं पण्डित मैं कइ कहूं, मूरख कै परवीन ।
लिया न तैं मत सूपका, चलनीका मतलीन ॥
दया गहेते सब नशें, पाप ताप दुख द्वन्द ।
ऐसी परम पुँनीत⁴कूं, तजै सो मूरख अन्ध ॥
दया बिना नर पतित है, दया बिना नर दुष्ट ।
दया बिना सुनवत बने, सबही थोथी गुष्ट ॥
जन्म मरण छूटै नहीं, नाहीं कर्म्म नशाहिं ।
दया बिना बदला भरै, चौरासी के माहिं ॥
काम क्रोध मोह लोभये, गरबआदि भजिजाहिं ।
चरणदास कहैं दया जो, घट में पहुंचै आहिं ॥
जितने वैरी जीव के, तिनमें रहै न एक ।
चरणदास यों कहत हैं, दया जो आवै नेक ॥
दुख भाजैं सुख हों घने, काया नगरी ढंग ।
१ बगुला २ जीवमारना ३ मट्ठा ४ पवित्र ॥