भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ दयाअंग वर्णन ॥
दो० परमारथ में दया बड़, जो घट उपजै आय ।
परगट हो निर्वैरता¹, कर्म गांठि खुल जाय ॥
थावर जंगम चर अचर, या जग में हो कोय ।
सबही पै हित राखिये, सुखदानीही होय ॥
भोजन करौ सँभाल करि, पानी पीजौ छान ।
हरा वृक्ष नहिं तोड़िये, कर्म बचै यों जान ॥
औरौ बहुत विचारले, जामें लगै न कर्म ।
यही तपस्या जानिये, यही दया यहि धर्म ॥
इक इन्द्री दो इन्द्रियां, ती इन्द्री अरु चार ।
पंच इन्द्री लौं जीवकी, हिंसा अकस निवार ॥
खावै वस्तु विचारि कै, बैठै ठौर विचार ।
जो कुछकरै विचारकरि, किरिया यही अचार ॥
मन सों रहु निर्वैरता, मुख सूं मीठा बोल ।
तन सूं रक्षा जीव की, चरणदास कहि खोल ॥
करुवा वचन न बोलिये, तन सूं कष्टन देहु ।
अपनासा जी जानिकै, बनै तौ दुख हरिलेहु ॥
मुख सूं जो करुवा कहै, तन सूं देवै कष्ट ।
यही जु हिंसा जानिये, दया धर्मजा नष्ट ॥
दश इन्द्री मन ग्यारहवां, करि विचारि ले जान ।
इनहीं सूं सुख दीजिये, चरणदास पहिचान ॥
काहू दुख नहिं दीजिये, दुर्जन हो कै मीत ।
सुखदायी सब जगतको, गहो दया की रीत ॥
कोमलता परपीरता, सज्जनता निर्दोष ।
१ किसी से लड़ाई न मानना ॥