भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
DevanagariHindipublished690 पृष्ठ
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२०४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
हिंसा रानी जो भजै, लेकर अपनो संग ॥
धन्य दया धनि शील कूं, जिनसे रीझे राम ।
गुरु शुकदेव बतावई, सबही सुधरै काम ॥
- इति दया का अंग सम्पूर्णम् ॥
( माया अंग वर्णन )
राग भैरव ॥
बैठा गुरु सूँ चलता चेला । सुखी होय रहै रैन अकेला ॥
दया क्षमा रख राम सुहाती । बात कहै करुई नहिंताती ॥
बिन जांचे उपदेश न दीजै । तरंकी¹ सूँ चर्चा नहिं कीजै ॥
मौन गहै थोरासा बोले । पलक न मिलै नैनरहै खोले ॥
दृष्टिराख नासाके आगे । सत्य वचन मीठा मुख भाषे ॥
रसना उलट अकाश चढ़ावै । बिनहीं बादल जल बरसावै ॥
पवन साधि मनकूं ठहरावै । कामिनि कनक रूप बिसरावै ॥
आसन अडिग² सुरत अनहद में। अन्तर खोल मिलै नहिं जगते ॥
चरणदास शुकदेव बतावै । ऐसा होय महन्त कहावै ॥
दो० जो बोलै तौ हरिकथा, मौन गहै तौ ध्यान ।
चरणदास यह धारणा, धारै सो संज्ञान ॥
माया की अस्तुति करूं, होय रही संसार ।
अद्भुत लीला कर रही, शोभा अगम अपार ॥
माया सकल पसार है, नाना रँग बहु क्रान्ति ।
जहँलग यह आकारही, चंचल मिथ्या भ्रान्तिं³ ॥
जसे सुपना रैन का, मुख दर्पण के माहिं ।
भासै है पर है नहीं, ज्यों तरवर की छाहिं ॥
१ तर्क करनेवाले अर्थात् पाखण्डी २ किसी का लगाव न हो जिससे डिगे
नहीं ३ भर्मना ॥