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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 236, कुल 690 में से

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पृष्ठ 236

भक्तिपदार्थवर्णन । २०१
ज्वानी शील न राखिया, बिगड़ गई सब देह।
अब पछितावा क्या करै, मुख पर उड़िया खेह¹ ॥
शील गये शोभा घटै, या दुनिया के माहिं ।
कूकरज्यों झिड़क्यों फिरै, कहीं भी आदर नाहिं ॥
शील गये गुरू सूं फिरै, हरि सों बेमुख होय ।
चरणदास कहाँ लौं कहैं, सर्वस डारै खोय ॥
धिक जीवन संसार में, ताको शील नशाय ।
जग में फिट फिट होत है, मुये ताचना पाय ॥
शील कसैला आँवला, और बड़ों के बोल ।
पाछे देवै स्वाद वै, चरणदास कहि खोल ॥
शील निरोगी नींबसा, औगुण डारै खोय ।
पहिले करुवा दुख लगै, पाछे गुण सुख होय ॥
लाख यही उपदेश है, एक शील कूं राख ।
जन्म सुधारौ हरि मिलौ, चरणदास की साख ॥
शीलवंत के चरण का, जो चरणोदक² लेय ।
रोग दोष मिटि जायँ सब, रहै न यमका भेय ॥
आठ अंग सूं शीलही, जाघट माहीं होय ।
चरणदास यों कहत हैं, दुर्लभ दर्शन सोय ॥
शीलवंत दर्शन बड़े, देखत पातक जाय ।
वचन सुनै मन शुद्ध हों, खोटी दृष्टि³ सिराय ॥
शील सरोवर न्हाय करि, करौ राम की सेव ।
यासम तीरथ और ना, कहिया गुरु शुकदेव ॥
शील अंग पूरो कियो, महिमा अधिक अपार ।
दया अंग वरणन करूं, समझै छुटै विकार ॥
१ धूरि २ पावोंका धोया हुआ जल ३ बुरी नज़र ॥