भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिपदार्थवर्णन । १६६
अरु भूप करै अभिमाना। उन आपैही कूं जाना॥
उन काल नहीं पहिंचाना। सो मार करै घमसाना॥
गुरु (शुकदेव चितावै। तोहिं परगट नैन दिखावै॥
यम वांधि पकरि, लेजावैं। वै बहुतै त्रास१ दिखावैं॥
जब कहां जाय अभिमाना। मेरा नीका सुन यह ताना॥
फिर डारै नरक मँझारी। सुनि चेतौ नर अरु नारी॥
तौ मद मत्सरता२ तजि दीजै। साधों के चरण गहीजै॥
हरि भक्ति करौ चितलाई। जब सकल व्याधि छुटिजाई॥
कर जाति वरणकुल दूरा। हो सतसंगति में पूरा॥
जब मुक्तधामकूं पावै। फिर गर्भ योनि नहिं आवै॥
कहैं गुरु शुकदेव बखानौ। यह चरणदास मन आनौ॥
दो० मनमें लाय विचारकूं, दीजै गर्व निकार।
नान्हापन जब आय है, छुटै सकल विकार॥
पांचौ उतरै भूत जब, ह्वैहौ ब्रह्म अरूप।
आनँद पद कूं पायहौ, जितहै मुक्तस्वरूप॥
पांच-प्रेत जो ये कहे, सतगुरुके परताप।
शील अंग अब कहतहूँ, जासूं छूटै पाप॥
अथ शीलअंग वर्णन ॥
दो० अब मैं गाऊँ शीलकूं, येहो सन्त सुजान।
नर नारी सबही सुनौ, दै दै चित बुधिकान॥
रूपगुणी कुलवंत जो, अरु होवै धनवन्त।
शील बिना शोभा नहीं, भिष्टै नरक पड़न्त॥
शील विना जो तप करै, करै शील बिन दान।
योग युक्तिकरै शील विन, सो कहिये अज्ञान॥
१ डर २ काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य ॥
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