भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
शील बड़ोही योगहै, जो कर जानै कोय ।
शीलविहीनो चरणदास, कवहूँ मुक्ति नहिं होय ॥
सब गुण लक्षणतो विषे, शील न आया एक ।
जपतप निष्फल जाहिंगे, चरणहिं दास विवेक ॥
पूजा संयम नेम जो, यज्ञ करै चितलाय ।
चरणदास कहैं शील बिन, सबी अकारथ जाय ॥
सोइ सती सोइ शूरमा, सोइ दाता अधिकाय ।
शील लिये नितही रहै, तौनिष्फल नहिंजाय ॥
शील अंग ऊंचो अधिक, उन तीसों के बीच ।
जाघट¹ शील न आइया, सो घट कहिये नीच ॥
शील न उपजै खेत में, शीलन हाट बिकाय ।
जो हो पूरा टेक का, लेवै अँग उपजाय ॥
शील बिना नरकै परै, शील बिना यम दण्ड ।
शील बिना भरमत फिरै, सात द्वीप नौ खण्ड ॥
शील बिना भटकत फिरै, चौरासी के माहिं ।
पहिले होवै प्रेत ही, यामें संशय नाहिं ॥
सब तजि सेवो शील कूं, राम नाम लौलाय ।
जीवत शोभा जगत में, मुये मुक्ति है जाय ॥
जाको शील सुभाव है, ताकी दूर बलाय ।
ताकी कीरंति² जगत में, सुनहो कान लगाय ॥
शील रहते सब रहें, जेते हैं शुभ अंग ।
ज्यों राजा के रहते, रहै फौज को संग ॥
सत्यगया तौ क्या रहा, शील गया सब झाड़ ।
भक्त खेत कैसे बचै, टूट गई जब बाड़ ॥
१ शरीर २ यश ॥