भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीमत्श्यामाचरणदासाचार्यमहिमा । २५
लहै पदारथ चार सो, श्री हरि वल्लभ होय २००
बानी रससानी सुनत, नास्तिकता होइ दूर ।
आस्तिकता उपजे अधिक, हरि गुन हिय भरपूर २०१
संप्रदाय शुकदेव मुनि, इष्ट राधिका श्याम ।
चरणदास वृन्दा विपिन, वरणन कीनो धाम २०२
नवनिकुंज ब्रजकी अमित, लीला के रस भेद ।
दिय जनाय निज जननको, कियो सकल भ्रम छेद २०३
दिव्य मानसी महल की, टहल करन की रीत ।
श्यामचरण के दास ने, प्रगट करी सह प्रीत २०४
अली मंजरी सहचरी, सखी सहेली भाव ।
ग्रन्थ भक्ति रस मंजरी, कहे तहां चितचाव २०५
दम्पति सेवा सुख मई, सब को दई बताय ।
श्यामचरण के दासहो, सहचरि पद लियो पाय २०६
रंगमहल युग टहल में, पहुँच लह्यो आनन्द ।
चरणदास चरणन परसि, पायो परमानन्द २०७
चरणदास के चरण की, लई शरण जिन आय ।
तिनको श्री प्रीतमप्रिया, लीने हैं अपनाय २०८
चरणदास के चरणको, जिनके लागो रंग ।
प्रेम पगे प्रीतम प्रिया, तजे न तिनको संग २०६
चरणदास के चरण में, जो दृढ़ लगे सनेह ।
रीझ तिन्हे राधे रसिक, महल खवासी देह २१०
चरणदास के चरण में, जो नवाय निज माथ ।
कुवँरि किशोरी राधिका, रीझ गहे तिहि हाथ २११
श्यामचरण के दास को, जपे प्रेमकर नाम ।
तिनको दम्पतिभुजन भर, हँसि भेटे सुख धाम २१२
चरणदास के ध्यान में, जो जनहो गलतान ।