भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ ब्रजचरित्रवर्णन ॥
दो०-दीनानाथ अनाथ का, विनती यह सुनिलेहु ।
मम हिरदय में आयकर, ब्रज कथा१ कहदेहु ॥
चारिवेद२ तुमकूं रटैं, शिव शारदा गणेश ।
और न शीश निवायहूं, श्रीकृष्ण करो उपदेश ॥
कै गुरु कै गोविन्द कूं, भक्ता कै हरिदास ।
सबहुँनको एकै गिनौ, जैसे पुहुप३ और बास४ ॥
नारदमुनि अरु व्यासजू, कृपा करहु दयाल ।
अक्षर भूलौं जो कहीं, कहौ मोहिं ततकाल ॥
श्रीशुकदेव दयाल गुरु, मम मस्तक पर ईश ।
ब्रजचरित्र कहत हौं, तुमहिं नवाऊँ शीश ॥
सबसाधुन प्रणाम करि, कर जोरूं शिरनाय ।
चरणदास बिनती करै, वाणी द्योह बनाय ॥
सदा शिव ब्रज में रहैं, करि गोपी को रूप ।
मूरति तौ परगट भई, आप रहत हैं गूप ॥
वंशीवट ढिग रहत हैं, करत रहत हैं ध्यान ।
वक्ता५ वेद पुराण के, परम उत्तम ज्ञान ॥
ब्रह्मादिक कलपत रहें, वृन्दाबन के हेत ।
सुधि आये ब्रजभूमिकी, बिसरिजाय सब वेद ॥
अब ब्रजकी गति गाय सुनाऊं । बुद्धि शुद्धि हरि भक्ति जु पाऊं ॥
चिन्ता मेटन भूमि बखानी । रण जीतमीत जहँदुर्म विनानी॥
कमलापति को चक्र सुदर्शन । चरणदास ताकोकरै वन्दन ॥
मथुरामण्डल तापर रहै । व्यासदेव मुनि ऐसे कहै ॥
१ सम्पूर्णहाल २ सामवेद ऋग्वेद यजुर्वेद अथर्वण ३ फूल ४ सुगन्ध ५ कहने
वाला ॥