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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 690 में से

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पृष्ठ 38

ब्रजचरित्रवर्णन । ७
नाचत मोर करत चतुराई । पंख पसारि मुदित मगनाई ॥
कैइक' उचक वोल निज बोलैं । कैइक कुञ्जन ऊपर डोलैं ॥
जुगल नामलैं कीर पुकारैं । बार बार वनओर निहारैं ॥
वृन्दावन चारौ जुग¹ माहीं । गोपरहैं शुकदेव बताहीं ॥
दो० वृन्दावनकी साधुगति, कापै वरणी जाय ।
जैसी जाकूं दृष्टि है, जैसोही दरशाय ॥
जैसे हरि मथुरा गये, सबन विलोको आय ।
काल कंसकी दृष्टि में, साधुन प्रभू लखाय ॥
मथुरा में जोधा बड़े, जिन्हें मल्ल दरशाय ।
नारिन दरशै कामसम, प्रीतिरीति अधिकाय ॥
वृन्दावन सोइ देखिहै, जिन देख्यो हरि रूप ।
दुर्लभ देवन कूं भयो, महागूप' ² सों गूप ॥
वृन्दावन सेवन करै, अमरलोक कूं जाय ।
इन्द्रीजीते हरि भजैं, प्रेम प्रीति के भाय ॥
रसिककेलि वृन्दावन माहीं । अमरलोक की भांति कराहीं ॥
अमरलोक तिहुँलोकसों न्यारो । मथुरामण्डल अंश विचारो ॥
अमरलोक विचहै निजधामा । जाको अंश वृन्दावन नामा ॥
पुरुषोत्तम निज धामा माहीं । कारण प्रेमरहै ब्रज आई ॥
पुरुषोत्तम प्रभु लीला धारी । वृन्दावन में सदा विहारी ॥
निजधामा की कहियत शोभा । वृन्दावन में रहें अलोपा ॥
दिव्य दृष्टि बिन दृष्टि न आवै । सकल पुराण वेद यों गावै ॥
गोल चौतरो निज वृन्दावन । तापरवारौं अपनो तनमन ॥
रहो चौतरो छिपि वहिठाहीं । जैसे अग्नि काष्ठके माहीं ॥
१ सतयुग त्रेता द्वापर कलियुग २ छिपाहुआ
३