सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 25

२० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बृन्दाबन से गवन कर, दिल्ली कियो निवास १३६
रहन लगे आनन्द सों, कृष्ण ध्यान गलतान ।
नर नारिन उपदेश दे, भजन करें भगवान १३७
दूर देश रमत करन, जावें श्री महाराज ।
भक्ति प्रचारें जक्त में, परमारथ के काज १३८
रूप अनेकन धार के, भक्तन करी सहाय ।
जल थल देश बिदेश में, चरणदास प्रगटाय १३६
बैष्णव नागरिदास को, जगन्नाथ निज रूप ।
दरसायो करि के कृपा, सुंदर अधिक अनूप १४०
बैजनाथ विप्रने लखे, श्री महाराज सुजान ।
चरण प्रछाले गंगजल, शिष्य ह्वगए अस्थान १४१
बैष्णव परमानंद की, मनसा पूरन कीन ।
कृष्ण रूप निज है प्रभो, दर्श दयानिधि दीन १४२
जोग जीत गुरु छोन कों, दरसायो निज धाम ।
अमर लोक सँग ले गये, जहां श्री राधे-श्याम १४३
राम सखी सह वपु गई, श्याम सुँदर के संग ।
जा पहुँची निज धाम में, जहां रास रस रंग १४४
श्री मति कुंजो मात कों, दरस कराये श्याम ।
तन को तज के फिर गई, अमरलोक निजधाम १४५
बिबिचारी जय करन को, कियो कृतारथ जाय ।
अमर लोक में ले गये, दम्पति दरस कराय १४६
स्वर्ग प्रवाही गंगजल, सेवक दिये न्हवाय ।
जय जय श्रीमहाराज की, सकल उठे मुख गाय १४७
साधू परमानंद को, डसो सर्प ने आय ।
श्यामचरण के दास प्रभु, लीनो तुरत जिवाय १४८
दो कन्या पैदा हुई, सेवक के घर आन ।