भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 36, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रजचरित्रवर्णन । ५
कामावन लालन सुखदाई । मधवन लालन भूमि सुहाई ॥
वृन्दावन की शोभा भारी । रास रच्यो जहाँ श्रीवनवारी ॥
वन उपवन शोभा गति ईशा । शिव ब्रह्मादिक नायो शीशा ।
इन्द्र वरुण - कुबेर विनानी*। इनहूँ गति मति ब्रजकी जानी ॥
बल रावण जहाँ सेवा लाई । ऊंची नवनिधि उनहूँ पाई ॥
सप्तऋषिनं मिलि सेवन कीन्हो । ऊंचो आसन ध्रुवको दीन्हो ॥
दो० बहुतक सुर नर तरिगये, तपकरि ब्रजके बीच ।
जाति पांतिको को गिनै, ऊंचा नीचा नीच ॥
वृन्दांवन सबसों बड़ो, जैसे दूधमें घीव ।
सब धर्मन हरिभक्ति ज्यों, जैसे पिण्डं में जीव ॥
सब तीरथ जगमें बड़े, जिनहूँ में हैं ईश ।
उन तीरथ फलकामना, इहि सेवन जगदीश ॥
बीस कोस के फेर में, वृन्दावन कूं जान ।
कुंजगली अति सोहनी, द्रुमंवेली पहिंचान ॥
कंचनकी जहाँ भूमि है, धरे सतोगुण भेष ।
चरणदास बलिबलि गयो, दिव्यदृष्टि करि देख ॥
फूल जु फूले ऋतु विना, नाना छवि बहुरंग ।
अलि मलकतगुञ्जत फिरें, भँवरी सुतलै संग ॥
ऋतुवसन्त जहँ नितरहत, विहरत नन्दकिशोर
कुहुँकत कोयल मगन होय, बोलत दादुर मोर ॥
तिहिमधि वृन्दावन महा, निज वृन्दावन जान ।
तिरकोणी वर्णन कियो, जोजेंन है प्रमान ॥
१ नारद, वशिष्ठ, भृगु, अंगिरा, कश्यप, विश्वामित्र, पुलस्त्य २ देह ३ लता
४ अमर ५ चारि कोसका नाम ॥
प्रथमपाठ ❀ इन्द्र कुबेर आदि विज्ञानी ॥