भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
हरि गुरु उर विश्वासरख, रहो सदा निष्काम १६२
तुम सब तन तजि आयहो, निश्चय मेरे धाम ।
प्रेम प्रीति कर प्यारसों, बोले गुरु गुण ग्राम १६३
श्री हरि आज्ञा सिरधरी, करी तयारी धाम ।
दशम द्वार निज पुरगये, जहाँ श्रीराधे श्याम १६४
-सम्बत अठारह सौ हुते, ऊपर उन्तालीस ।
देहत्याग चरनदास प्रभु, गये धाम जगदीस १६५
अस्सी बर्ष भूतल बिषे, राजे श्री महाराज ।
सरसमाधुरी भक्ति हरि, जक्त प्रचारन काज १६६
✱ श्रीमत्श्यामचरणदासाचार्यमहिमा ✱
चरणदास के चरण में, जो जन आये धाय ।
सूरज मण्डल बेधकर, बसे अमरपुर जाय १६७
भेजे श्यामा श्याम ने, करन जगत उद्धार ।
चरनदास ने कृपाकर, किये पतित भवपार १६८
चार पदारथ प्रेम सो, सबको कीने दान ।
चरणदास ने दयाकर, कियो जक्त कल्यान १६६
नवधा प्रेमा अरु परा, दियो भक्ति उपदेश ।
किये कृतारथ जीवजग, पार न पावत शेष १७०
ज्ञान दियो ज्ञानीन को, जोगिन को दियो जोग ।
भक्तनको दइ भक्ति हरि, मेटे भव दुख रोग १७१
ज्ञानी विज्ञानी बड़े, जोगिन के सिरताज ।
रसिका चारज मुकुटमणि, चरणदास महाराज १७२
दयावान दाता बड़े, परदुख भंजन हार ।
पतितन के पावन करन, चरणदास अवतार १७३
सब सद्गुण सम्पन्न हैं, सब लायक महाराज ।