भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीवृन्दावनगमनवर्णन । १६
बिछुरन दम्पति मन समझ, अतिशय भये उदास १२३
धरनि गिरे व्याकुल विरह, देह दशा विसराय ।
नैनन जल धारा बही, करत हाय हरि हाय १२४
इसी भांति बीतो दिवस, होय गई पुनि रैन ।
प्रगट भये शुकदेव मुनि, निजशिष्यको सुखदैन १२५
श्री सतगुरु नैनन निरखि, उठ करि चरण प्रणाम ।
व्याकुल हो बिलपन लगे, बिनश्रीश्यामाश्याम १२६
विनय करी कर जोर के, दम्पति दरस कराय ।
नाहीं तो तन त्यागि के, जीव निकस यहजाय १२७
श्री शुक मेस्तक शिष्य के, धरो कृपा कर हाथ ।
बंशीवट नीचे लखे, श्याम राधिका साथ १२८
गलबैंयां दीने युगल, नवल लाड़िली लाल ।
मंद मंद मुसकात मुख, रूप राशि छवि जाल १२६
श्री दम्पति के दरस कर, छके श्याम चरनदास ।
रोम रोम में प्रगट भयो, परमानंद हुलास १३०
शिष्य के मस्तक से तभी, मुनि लियो हाथ उठाय ।
दृष्टि परे दम्पति न तब, अचरजभयोअधिकाय १३१
श्री शुक मुनिचरनन परे, श्यामचरन के दास ।
धन्यवाद श्री गुरुन को, कीनो सहित हुलास १३२
पुनि गुरु शिष्य दोऊन में, ज्ञान गोष्टि सम्वाद ।
रह्यो रैन में रंग अति, उर उपजो आह्लाद १३३
प्रात होत शुक मुनि कही, सुनो श्याम चरनदास ।
दिल्ली जाके तुम करो, श्री हरि भक्ति प्रकास १३४
शिष्य करी तब दंडवत, श्री गुरुचरनों माहिं ।
शीश उठा देखन लगे, शुक मुनि दरसे नाहिं १३५
श्रीशुक मुनि धर ध्यानउर, श्यामचरन के दास ।