भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 35, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो०-वन उपवन अब कहतहौं, मथुरामण्डल माहिं ।
बिना भक्ति ब्रजनाथकी, क्योंहूं दीखत नाहिं ॥
उपवन कदम मंडतंवन दूजा । नंदीसुर नंदवन सूजा ॥
मंगल आनँद वन वहि गायो । जहां महर जा गांव बसायो ॥
संकेत वन सो सब जग जानै । बरसाने सब को पहिंचानै ॥
भोजन थाली वही कहायो । जहाँ बैठि भात हरि खायो ॥
सुगन्ध वन अब सो कहावै । अखण्ड वन पुस्तक दरशावै ॥
खेलन द्रुम वन खेलत रहें । मोहन वन केती वन कहैं ॥
दधि ग्राम वन वही कहायो । लूटि लूटि जहाँ दधि खायो ॥
वत्सहरनवन वही कहायो । ब्रह्मा माया देखि भुलायो ॥
दो०-ग्वाल बाल ब्रह्मा हरे, राखे कहूं दुराय ।
जानि बूझि टारो दियो । लीन्हें और बनाय ॥
जब ब्रह्मा समझो करिज्ञाना । कर्ता कृष्ण सत्य करिजाना ॥
फिरि चेतन है शीश नवायो । आदिपुरुष पुरुषोत्तम पायो ॥
द्वादश उपवन गाय सुनाये । मथुरा मण्डल मध्य बताये ॥
द्वादश वनकी गति सुनि लीजै । जिनमाहीं हरिध्यान करीजै ॥
भद्र वन अति महा सुहायो । श्रीवन लालन के मन भायो ॥
भांडीर वनकी महिमा गाऊं । भिन्न भिन्न कहितोहि समझाऊं ॥
लोहवन महिमा कहियत भारी । महावन सुन्दरता अति धारी ॥
तालर वन वहि दृष्टि निहारो । दानव धेनुक जहँ हरि मारो ॥
दो०-दानौ धेनुक महाबली, भाव भक्ति हरि हेत ।
मुक्तिकाज सेवन कियो, तालरवन को खेत ॥
खदिरवन जानत सब कोई । फूल माल जहँ लालन पोई ॥
बहुलावन घन दुरमन छायो । कुमुदवन तो सो कहिसमुझायो ॥
१ प्रथमपाठ।