सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 20

श्रीवृन्दावनगमनवर्णन । १५
मारो निस्तारो तुमहि, मोको गति नहिं आन ७२
गंगाजल सम श्याम तुम, मैं हों तुम्हरा मीन ।
तुम माता मैं पुत्रवत, समझो सत्य प्रवीन ७३
तुम गैया मैं बत्स सम, मैं पतंग तुम दीप ।
यही चाह चित में बसे, निशिदिन रहों समीप ७४
कहनलगे श्रीकृष्ण तब, सुनहु श्याम चरनदास ।
तुमरे हिय माहीं रहै, हमरो सदा निवास ७५
सन्त हमारी आतमा, यामें नहिं संदेह ।
रोम रोम में रमि रहै, ज्यों बादर में मेह ७६
आज्ञा जो हमने दई, लीजे प्यारे मान ।
भक्ति प्रचारो भक्त में, करो जियन कल्यान ७७
जो आज्ञा करिहों यही, कही चरणही दास ।
देखो चाहूँ सांवरे, सुन्दर रास बिलास ७८
ह्वै प्रसन्न बोले लला, मूंदो अपने नैन ।
आज्ञा दूँ तब खोलियो, हे प्रीतम सुख दैन ७६
मूंदे तबहीं नैन निज, चरणदास तेहि बार ।
बोले पुनि श्रीश्यामघन, देखो पलक उघार ८०
दृगन खोल देखन लगे, तेजोमय उजियार ।
रत्न जटिल अवनी लखी, जगमग जोति अपार ८१
ऋतु बसंत संतत तहाँ, अनगिन बाग बहार ।
फूले फूल अनेक जहाँ, लहरत लता अपार ८२
फुलवारी क्यारी बनी, न्यारी नाना रंग ।
तरुन माहिं बहु वरन के, बोलत विविधि विहंग ८३
बीच विविधि कुंजस्थली, छाई बेलि वितान ।
तिन में सेवा हित रहें, सहचरि सखी सुजान ८४