भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
उज्वल नवल निकुंजरस, करे निरन्तर पान २१३
भजे भावकर जिन्होंने, श्याम चरण के दास ।
पहुँचे सोइ निकुंज में, जहाँ नित्य रस रास २१४
होत रहत जहां परस्पर, दम्पति विविध विलास ।
रहत निकटवर्ती तहां, श्याम चरण के दास २१५
गुस प्रगट लीला ललित, करत राधिका श्याम ।
चरणदास चरणन परसि, पाय तहां बिश्राम २१६
दृढ़ करगहे अनन्य व्रत, चरणदास प्रभु . इष्ट ।
सरसमाधुरी रस मिले, महा मधुर अति मिष्ट २१७
जो जन मन वच कर्मकर, भजे श्याम चरनदास ।
रिधिसिधि सम्पति प्राप्तहो, अशुभ अमंगल नास २१८
लोक और परलोक के, रक्षक श्री महाराज ।
सरस माधुरी शरण की, सबविधि उनको लाज २१६
स्वामी रामहि रूपजी, जोग जीतजी जान ।
दोउनने अनुपम कह्यो, जीवन चरित बखान २२०
तिन दोउनको सार यह, सूक्ष्म रचना कीन ।
पढ़ौ सुनौ सब प्रेमसों, साधू रसिक प्रवीन २२१
जैसे सुन्दर सुमन की, लई सुगन्धि निकार ।
सरस माधुरी ने रचो, यह चरितामृत सार २२२
चरितामृत का। प्रीतकर, पठन करे नित जोय ।
सुफल होहिं सब मनोरथ, गुरुभक्ति दृढ़ होय २२३
शुभ सम्बत उन्नीससौ, और तिहत्तर जान ।
चैत्र कृष्ण तिथि द्वादशी, भयो समाप्त सुखदान २२४
जयपुर शहर सुहावनो, जहां दरीबा पान ।
सरसमाधुरी ने कह्यो, चरितामृत रसखान २२५
इति ॥