भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
निरखत छवि रस माधुरी, हर्ष न हृदय समाय ११०
लेत स्वल्पगति लाड़लो, बहुबिधि भाव बताय ।
नैन नचा लचकाय कटि, ताथेइया मुख गाय १११
अंग संग दै अधर रस, प्यावत प्रेम बढ़ाय ।
चरणदासि को श्यामघन, लेत भुजन भर धाय ११२
मुकट लटक मन को हरत, अलक रही बलखाय ।
छुटी कपोलन लाल के, चित को लेत चुराय ११३
मकराकृत कुंडल श्रवन, नाक बुलाक सुढार ।
मोती मटकत अधर पर, अजब सुराहीदार ११४
पाजामा कछनी ललित, पीत रंग मनहार ।
नख शिख लो भूषन सजे, गल फूलन के हार ११५
रंग रँगीली लाड़िली, मदन मनोहर लाल ।
नटवर गति ले ले नई, रस बस कीनी बाल ११६
श्री राधे रासेश्वरी, सखियन की सरदार ।
दरसायो चरनंदासि को, नित नवरास बिहार ११७
पुनि राजे दम्पति तबहि, सिंहासन पर जाय ।
चरणदासि को कर कृपा, लइनिज निकटबुलाय ११८
हँसि बोले श्री हरि बचन, करके प्रेम अपार ।
चरणदासि जा जक्त में, भक्ति करो विस्तार ११६
तबहि दासि दोउ जोर कर, आज्ञा सिर धर लीन ।
परिक्रमा करके बहुर, चरण प्रणाम सुकीन १२०
नैन मूंदि निज लीजिये, कही कृष्ण भगवान ।
दृग मूंदे तब दास ने, ताही समय पिछान १२१
पुनि आकाशबानी भई, चक्षु खोल चरनदास ।
दृग खोलतही आ गये, बंशीवट के पास १२२
संतरूप आपन लखो, श्याम चरन के दास ।